धान, गेहूँ, जौ, राई आदि फसलों के डण्ठल को तृण (Straw) कहते हैं। यह कृषि का एक सह-उत्पाद है। तृण बहुत से कार्यों के लिये उपयोगी है जैसे, पशुओं का चारा, ईंधन, पशुओं का बिछौना, छप्पर बनाना, टोकरी बनाना, घर की दीवारें बनाना आदि। तृण को तरह-तरह के गुटके (बण्डल) बनाकर या एक बडी ढेरी बनाकर भण्डारित किया जाता है।

इन्हें भी देखें
तृण से निर्माण
सूखी घास
 भूसा

बाहरी कड़ियाँ 
पुआल आधारित खेती (इण्डिया वाटर पोर्टल)

बायोमास
निर्माण सामग्री
पशुपालन
जैवनिम्‍ननीय सामग्री
संगम के अन्य अर्थों के लिये यहां जाएं - संगम (बहुविकल्पी)

संगम का अर्थ है मिलन, सम्मिलन। भूगोल में संगम उस जगह को कहते हैं जहाँ पानी की दो या दो से अधिक धाराएँ मिल रही होती हैं। जैसे इलाहाबाद में गंगा, यमुना (और, लोककथाओं के अनुसार, सरस्वती) के मिलन स्थल को त्रिवेणी संगम कहते हैं।

त्रिवेणी संगम प्रयागराज

प्रयागराज का संगम हिन्दुओं के लिए पवित्र है। प्रयागराज में गंगा- यमुना और सरस्वती नदी का संगम है। धार्मिक महत्व और ऐतिहासिक कुम्भ मेला प्रत्येक 12 वर्षों में यही लगता है। वर्ष 1948 में महात्मा गांधी समेत कई राष्ट्रीय नेताओं की राख का विसर्जन यही किया गया थी। 

गंगा और यमुना के संगम का यह विवरण ऋग्वेद के नवीनतम खंडों में उल्लेख किया गया है जिसके अनुसार,"जो लोग उस जगह पर स्नान करते हैं जहां दो नदियां एक साथ बहती हैं,उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति होती हैं"। पुराणों के अनुसार, एक तीसरी नदी भी है जिसे सरस्वती कहा जाता है।

मूल 
संस्कृत - सम् (समान) + गम्(जाना) = संगम।

अन्य अर्थ 
सनातन धर्म के तमिल साहित्य को संगम साहित्य भी कहते हैं।
पिंगला नाड़ी, इड़ा नाड़ी और सुषुम्ना नाड़ी के मिलन-स्थल पर ध्यानाभ्यास करने को भी संगम उपासना कहते हैं।

संबंधित शब्द

हिंदी में 
 निगम
 मिलन
 सम्मिलन
 मेल
 मिलाप

अन्य भारतीय भाषाओं में निकटतम शब्द 

शब्दार्थ
नदी आकृतिकी
नदी संगम
संध्या ("शाम") का सामान्य अर्थ सूर्य के अस्त होने और रात्रि के प्रारंभ के काल से है। 

संध्या एक संस्कृत शब्द है। सूर्य और तारों से रहित दिन-रात की संधि को तत्त्वदर्शी मुनियों ने संध्याकाल माना है।

संध्या से ही दिन और रात्रि दोनों के संधिकालों के नाम प्रातःकाल ( रात्रि और दिन का मध्य ) और सायंकाल (रात्रि और दिन का मध्य ) नाम हुए।
प्रातःकाल की पूजा देवताओं का पोषण करती है तो सायंकाल की पूजा पित्रों का पोषण करती है।

त्रिकाल संध्या प्रातःकाल में तारों के रहते हुए, मध्याह्नकाल में जब सूर्य आकाश के मध्य में हों, सायंकाल में सूर्यास्त के पहले ही - इस तरह तीन प्रकार की संध्या करनी चाहिए।

पौराणिक अर्थ 
संध्या ब्रह्मा की मानस पुत्री हैं और पित्रों की माता कही गयी हैं। शिवपुराण के अनुसार पूर्वकाल की तपस्या से संन्ध्या ही कालान्तर में सप्तर्षियों में श्रेष्ठ महर्षि वशिष्ठ की पत्नी अरून्धती के रुप में सर्वश्रेष्ठ सती के रुप में तीनों लोकों में प्रसिद्ध हैं।

उदाहरण 
 संध्या के समय घर में दीपक लगाना या प्रकाश करना भी आवश्यक माना जाता है। (शाम के समय घर में दीपक जरूर लगाना चाहिए क्योंकि...)

संबंधित शब्द 
 संध्यावन्दनम्
 संध्योपासना

अन्य भारतीय भाषाओं में निकटतम शब्द

सन्दर्भ

शब्दार्थ
सूर्य या किसी अन्य तारे के चारों ओर परिक्रमा करने वाले खगोल पिण्डों को ग्रह कहते हैं। अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ के अनुसार हमारे सौर मंडल में आठ ग्रह हैं - बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, अरुण और वरुण। इनके अतिरिक्त तीन बौने ग्रह और हैं - सीरीस, प्लूटो और एरीस। प्राचीन खगोलशास्त्रियों ने तारों और ग्रहों के बीच में अन्तर इस तरह किया- रात में आकाश में चमकने वाले अधिकतर पिण्ड हमेशा पूरब की दिशा से उठते हैं, एक निश्चित गति प्राप्त करते हैं और पश्चिम की दिशा में अस्त होते हैं। इन पिण्डों का आपस में एक दूसरे के सापेक्ष भी कोई परिवर्तन नहीं होता है। इन पिण्डों को तारा कहा गया। पर कुछ ऐसे भी पिण्ड हैं जो बाकी पिण्डों के सापेक्ष में कभी आगे जाते थे और कभी पीछे - यानी कि वे घुमक्कड़ थे। Planet एक लैटिन का शब्द है, जिसका अर्थ होता है इधर-उधर घूमने वाला। इसलिये इन पिण्डों का नाम Planet और हिन्दी में ग्रह रख दिया गया। शनि के परे के ग्रह दूरबीन के बिना नहीं दिखाई देते हैं, इसलिए प्राचीन वैज्ञानिकों को केवल पाँच ग्रहों का ज्ञान था, पृथ्वी को उस समय ग्रह नहीं माना जाता था।

ज्योतिष के अनुसार ग्रह की परिभाषा अलग है। भारतीय ज्योतिष और पौराणिक कथाओं में नौ ग्रह गिने जाते हैं, सूर्य, चन्द्रमा, बुध, शुक्र, मंगल, गुरु, शनि, राहु और केतु। ग्रह दो प्रकार के होते है। आंतरिक ग्रह और बाह्य ग्रह। आंतरिक ग्रह में बुध शुक्र पृथ्वी मंगल,और बाह्य ग्रह में बृहस्पति शनि अरुण और वरुण है।
मंगल और बृहस्पति के कश्चाओ के मध्य एस्टेरॉयड चक्कर लगाते है।

सन्दर्भ

खगोलशास्त्र
ज्योतिष
उपतारकीय वस्तुएँ

ग्रह विज्ञान
गृह एक हिन्दी शब्द है जिसका अर्थ है घर या आवास। अंग्रेज़ी में इसे house भी कहते हैं। यह शब्द, ग्रह शब्द से भिन्न है.

उदाहरण 
पृथ्वी सौर मंडल का एक मुख्य गृह है।

घर के विभिन्न भाग 

 प्रांगण (atrum)
 अटारी (attic)
 कुन्ज (alcove)
 तलघर (basement)
 स्नानगृह (bathroom) 
 शौचालय (toilet)
 शयनकक्ष (bedroom)
 शिशुकक्ष (nursery- infant bedroom)
 रक्षागृह (conservatory)
 भोजनकक्ष (dining-room)
 बैठक (living-room/sitting-room/family-room)
 प्रवेशकक्ष (foyer/ entrance hall)
 यानगृह (garage)
 गलियारा (hallway/passage)
 रसोईघर (kitchen)
 आहार-अलमारी (larder)
 धुलाई कक्ष (laundry room)
 पुस्तकालय (library)

मूल

अन्य अर्थ

संबंधित शब्द

हिंदी में 
 घर

अन्य भारतीय भाषाओं में निकटतम शब्द 

शब्दार्थ
संबल का अर्थ है सहयोग देना या ढांढस बढ़ाना, विशेषकर मुश्किल परिस्थितियों में। अंग्रेजी में इसका अर्थ है support।

उदाहरण 
सीता के बिछड़ने से परेशान राम और लक्षमण को हनुमान के आश्वासन से बड़ संबल मिला।

मूल

अन्य अर्थ

संबंधित शब्द

हिंदी में

अन्य भारतीय भाषाओं में निकटतम शब्द 

शब्दार्थ
गर्भाशयग्रीवा (cervix या cervix of uterus या cervix uteri) गर्भाशय का मुख है। स्त्री के शरीर में बाहर से दिखने वाली संरचना को योनि द्वार (vulva) कहा जाता है। योनि के जितने भाग में पुरुष का लिंग प्रवेश करता है , उतना भाग योनि (vagina) है। लिंग से निकलने वाला वीर्य इस ग्रीवा से अंदर प्रवेश करके गर्भाशय में पहुँचता है।

सन्दर्भ

इन्हें भी देखें
गर्भाशयग्रीवा कैन्सर
गर्भाशय

बाहरी कड़ियाँ
गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर से सबसे अधिक होती है महिलाओं की मौत

शरीर के अंग
द्वीप स्थलखण्ड के ऐसे भाग होतें हैं, जिनके चारों ओर जल का विस्तार पाया जाता हैं। आकार में द्वीप छोटे भी हो सकते हैं तथा बड़े भी। इनका आकार कुछ वर्ग मीटर से लेकर ह्ज़ारों वर्ग किलोमीटर तक पाया जाता हैं।मोतियों का द्वीप बहरीन द्वीप को कहा जाता है। ज़्यादातर समुन्द्र के भीतर पनप रही ज्वालामुखी की देन हैं और कुछ वो हैं जो समय के साथ-साथ किसी बड़े महाद्वीप से अलग होकर कहीं दूर वीरान समंदर में बिखर गए। जिनमें से कुछ द्वीप ऐसे हैं जहा पूरे देश बसे हैं जैसे फिजी आइलैंड और उसके अलावा कुछ द्वीपों के समूह भी मिलकर 1 देश बनाते हैं जैसे -हवाई आइलैंड जो महाद्वीपों से अलग गिने जाते हैं और इनकी गिनती ओशिआनिया समूह में होती हैं।

भारत में अंडमान, लक्षद्वीप आदि समुद्र में तथा मजुली ब्रह्मपुत्रा नदी में बना द्वीप है । विश्व में ब्रिटेन, जापान, अयरलैंड, मेडगास्कर, फॉकलैंड (अटलांटिक) आदि प्रमुख द्वीप देश या प्रदेश हैं । जापान कई द्वीपों से बना है ।

स्थिति के अनुसार द्वीपो का वर्गीकरण 
स्थिति के आधार पर द्वीप तीन प्रकार के होते हैं जो कि निम्नलिखित 
 महाद्वीपीय द्वीप
 महासागरीय द्वीप
 आभ्यान्तिक द्वीप

उत्पत्ति के अधार पर द्वीपो का वर्गीकरण 
 विवर्तनिकि द्वीप
 स्थलीय भाग के निमज्ज्न से बने द्वीप
 सागरीय नितल से निमज्ज्न से बने द्वीप
 भू-भ्रंशन या दरार से निर्मित द्वीप
 महाद्वीपीय प्रवाह  से निर्मित द्वीप

चित्र दीर्घा 

द्वीप
समुद्र-वैज्ञानिक पारिभाषिकी
समतल, समधरातल, समस्तर या हमवार (अंग्रेजी: plane, प्लेन) ज्यामिति में किसी दो आयामों (डायमेंशनों) वाली ऐसी चपटी सतह को कहते हैं जिसकी मोटाई शून्य हो। किसी भी तीन या उस से अधिक आयामों वाले दिक् (स्पेस) में एक समतल में काटकर एक समस्तर बनाया जा सकता है।

इन्हें भी देखें 
 सतह
 ज्यामिति

सन्दर्भ 

सतहें
ज्यामिति
समान का अर्थ जैसा है। 

समान एक हिन्दी शब्द है।

उदाहरण 

 एक समान सलूक
 समान अवधि

मूल

अन्य अर्थ

संबंधित शब्द

हिंदी में

अन्य भारतीय भाषाओं में निकटतम शब्द 

शब्दार्थ
तिक्त का अर्थ "कड़वा"

उदाहरण 
समतल देशों से आ-आकर
पावस की उमस से आकुल
तिक्त-मधुर बिसतंतु खोजते
हंसो को तिरते देखा है
बादल को घिरते देखा है।
        यहाँ तिक्त का सटीक अर्थ "कड़वा " होगा।
तिक्त का एक अर्थ "मिर्च के स्वाद जैसा" भी होता है।
तिक्ता का अर्थ नीम का पेड़ होता है।

मूल 
तिक्त शब्द का प्रयोग हिंदी और मैथिली के प्रमुख लेखक व कवि आदरणीय नागार्जुन जी की रचना "बादल को घिरते देखा है" नामक कविता में हुआ है।

अन्य अर्थ

संबंधित शब्द

हिंदी में 
तीखा

अन्य भारतीय भाषाओं में निकटतम शब्द 

शब्दार्थ
सम्बन्ध का मतलबः

 लोगों के बीच के रिश्ते
 अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्ध

उदाहरण 
 पति -पत्नी के सम्बन्ध
 भारत-चीन सम्बन्ध

मूल

अन्य अर्थ

सम्बन्धित शब्द

हिन्दी में

अन्य भारतीय भाषाओं में निकटतम शब्द 

शब्दार्थ
विधि के सन्दर्भ में, षड्यन्त्र का सामान्य अर्थ साज़िश, धोखा देने की योजना, दुरभिसन्धि, गुप्तरूप से की जाने वाली कार्रवाई आदि के रूप में लिया जाता है।

 भारतीय दण्ड संहिता की धारा 120-क के अनुसार आपराधिक षड्यन्त्र की परिभाषा

जब दो या दो से अधिक व्यक्ति किसी अवैध कार्य या किसी वैध कार्य को अवैध तरीके से करने या करवाने को सहमत होते हैं तो उसे आपराधिक षड्यन्त्र कहते हैं।

अर्थात षडयन्त्र के लिए दो या दो से अधिक व्यक्तियों का होना आवश्यक है, कोई अवैध कार्य करना/अकरवाना या कोई वैध कार्य अवैध साधनों द्वारा करना/करवाना आवश्यक है।

अवैध कार्य – आपराधिक षड्यन्त्र के अपराध को गठित करने के लिए समझौता निश्चयतः विधि विरुद्ध अथवा विधि द्वारा निषिद्ध कोई कार्य करने के लिए होना चाहिए।

अवैध साधनों द्वारा – किसी कार्य को, भले ही वह वैध हो, अवैध साधनों द्वारा करने की सहमति षड्यन्त्र मानी जाएगी। कार्य का अन्त साधनों को न्यायोचित नही ठहराता। उदाहरण के लिए प्रतिद्वन्दी व्यापारी को मात देना अवैध कार्य नही है परन्तु सस्ती वस्तुओं के विक्रेता को नष्ट करने के लिए एकीकृत होकर एक दिवालिया क्रेता को ऋण देने के लिए प्रोत्साहन देकर विक्रेता को हानि पहुचाना अवैध होगा।

षड्यन्त्र का प्रमाण – आपराधिक षड्यन्त्र हेतु यह आवश्यक नही है कि किये गये अभिकथित समझौते का प्रत्यक्ष साक्ष्य द्वारा साबित किया जाए क्योंकि ऐसा साक्ष्य सामान्यतः उपलब्ध नही होता।

हीरालाल हरिलाल भगवती बनाम सी.बी.आई. (2003) उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि षड्यन्त्र के अपराध को भारतीय दण्ड संहिताकी धारा 120-B के दायरे में लाने के लिए यह सिद्ध करना आवश्यक है कि पक्षकार के बीच विधिविरुद्ध कार्य करने का करार हुआ था तथापि प्रत्यक्ष साक्ष्य से षड्यन्त्र को सिद्ध करना कठिन है।

सेन्ट्रल ब्यूरो आफ इन्वेस्टिगेशन, हैदराबाद बनाम नारायण राव (2012) के वाद में यह अभिनिर्धारित किया गया कि किसी कार्य का करार आपराधिक षड्यन्त्र का मूल तत्व है। आपराधिक षड्यन्त्र का प्रत्यक्ष साक्ष्य मिलना यदा कदा उपलब्ध होता है यह घटना के पूर्व या बाद की परिस्थितियों के आधार पर सिद्ध किया जाता है। सिद्ध परिस्थितियों को यह स्पष्ट दर्शाना चाहिए कि वे एक करार के अग्रसरण में कारित की गयी है।

आपराधिक षड्यन्त्र का आधार करार में निहित है लेकिन एक अवयस्क किसी प्रकार से षड्यन्त्र में शामिल नही हो सकता इसीलिए जब एक अवयस्क के साथ कोई व्यक्ति करार करके आपराधिक षड्यन्त्र गठित करता है तो वहा पर करार शून्य होने के कारण वह व्यक्ति आपराधिक षड्यन्त्र के लिए दायी नही होगा लेकिन वह धारा 107 के अधीन एक अवयस्क के दुष्प्रेरण के अपराध के लिए दायी होगा।

 धारा 120-B. आपराधिक षड्यन्त्र के लिए दण्ड

(१) जो कोई दो वर्ष से अधिक अवधि के कठिन कारावास से दण्डनीय अपराध करने के आपराधिक षड्यन्त्र में शरीक होगा, यदि ऐसे षड्यन्त्र के दण्ड के लिए इस संहिता में अभिव्यक्त उपबन्ध नही है तो, वह उसी प्रकार दण्डित किया जाएगा, मानो उसने ऐसे अपराध का दुष्प्रेरण किया था।

(२) जो कोई पूर्वोक्त रूप से दण्डनीय अपराध को करने के आपराधिक षड्यन्त्र से भिन्न किसी आपराधिक षड्यन्त्र में शरीक होगा वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि 6 माह से अधिक नही होगी या जुर्माने से या दोनों से दण्डित किया जाएगा।

आपराधिक षड्यन्त्र और दुष्प्रेरण में अन्तर
धारा 120-क आपराधिक षड्यन्त्र की एक विस्तृत परिभाषा प्रदान करती है जिसके अन्तर्गत वे कार्य सम्मिलित हैं जो धारा 107 के अन्तर्गत षड्यन्त्र के माध्यम से दुष्प्रेरण (Abatement) के समतुल्य हैं और इसी कारण जहां कोई आपराधिक षड्यन्त्र धारा 107 के अन्तर्गत दुष्प्रेरण के समतुल्य है वहा धारा 120-क या 120-ख की सहायता आवश्यक है। धारा 107 के अन्तर्गत अपराध गठित होने के लिए कोई कार्य अथवा अवैध लोप षड्यन्त्र के अनुसरण में होना चाहिए, वहीं धारा 120-क में मात्र सहमति ही पर्याप्त है यदि वह किसी अपराध के करने के सम्बन्ध में है। जहां तक षड्यन्त्र के माध्यम से दुष्प्रेरण का सम्बन्ध है दुष्प्रेरक धारा 108 से 117 तक में वर्णित विभिन्न परिस्थितियों के अन्तर्गत दण्डनीय होगा वही धारा 120-A में वर्णित आपराधिक षड्यन्त्र का अपराध धारा 120-B के अन्तर्गत दण्डनीय है।

शाब्दिक अर्थ 
किन्तु विश्लेषणात्मक रूप से देखें तो 'षड्यन्त्र' शब्द इस प्रकार बना है :- षड्+यन्त्र = षड्यन्त्र , अर्थात् छह यन्त्र या छह विधियाँ । 

इसमें जिन छह विधियों के बारे में बताया जाता है, वे हैं :- जारण , मारण , उच्चाटन , मोहन , स्तम्भन , विध्वंसन ।  इन्ही छह यन्त्रों या छह विधियों के माध्यम से 100 (सौ) वर्गों के समावेश करके लकड़ी के पटल मे षड्ययन्त्र खेला जाता है| आज आधुनिक समय मे 64 (चौंसठ) वर्गो के पटल मे चेस (CHESS) को खेला जाता है| 

1. जारण :-
‘जारण’ का अर्थ जलाना या भस्म करना है । यह संस्कृत के ‘ज्वल्’ से निकला है । 

2. मारण :-
‘मारण’ यन्त्र का आशय एकदम स्पष्ट है । शत्रु का अस्तित्व समाप्त करना  ‘मारण’ कहलाता है । 

3. उच्चाटन :-
‘उच्चाटन’ का अर्थ है स्थायी भाव मिटाना । वर्तमान परिस्थिति को भंग कर देना । उखाड़ना, हटाना आदि । विरक्ति, उदासीनता या अनमनेपन के लिए आम तौर पर हम जिस उचाट, दिल उचटने की बात करते हैं उसके मूल में संस्कृत का ‘उच्चट’ शब्द है जो ‘उद्’ और ‘चट्’ के मेल से बना है । उद्-चट् की सन्धि उच्चट होती है । ‘उद’ यानी ऊपर ‘चट्’ यानी छिटकना, अलग होना, पृथक होना आदि । ‘उच्चाटन’ भी इसी उच्चट से बना है जिसका अर्थ हुआ उखाड़ फेंकना, जड़ से मिटाना, निर्मूल करना आदि ।

4. मोहन :-
जब ‘जारण’, ‘मारण’, ‘उच्चाटन’ जैसे यन्त्रों से काम नहीं बनता तो ‘मोहिनी विद्या’ काम आती है । ‘मोहन’ का अर्थ है मुग्ध होना । इसके मूल में ‘मुह्’ धातु है जिसका अर्थ है सुध बुध खोना, किसी के प्रभाव में खुद को भुला देना । अक्सर नादान लोग ऐसा करते हैं और इसीलिए ऐसे लोग ‘मूढ़’ कहलाते हैं । मूढ़ भी ‘मुह्’ से ही निकला है और ‘मूर्ख’ भी । ‘मोहन यन्त्र’ का मक़सद शत्रु पर ‘मोहिनी शक्ति’ का प्रयोग कर उसे मूर्छित करना है । श्रीकृष्ण की छवि में ‘मोहिनी’ थी इसलिए गोपिकाएँ अपनी सुध-बुध खो बैठती थीं इसलिए उन्हें ‘मोहन’ नाम मिला । 

5. स्तम्भन :-
पाँचवी विधि है ‘स्तम्भन’ जिसका अर्थ है जड़ या निश्चेष्ट करना । यह ‘स्तम्भ’ से बना है । जिस तरह से काठ का खम्भा कठोर, जड़ होता है उसी तरह किसी सक्रिय चीज़ को स्तम्भन के द्वारा निष्क्रिय बनाया जाता था । 

6. विध्वंसन :-
षड्यन्त्र की छठी और आखिरी प्रणाली है ‘विध्वंसन’ अर्थात पूरी तरह से नाश करना।

शब्दार्थ
जलवा एक हिन्दी शब्द है।

उदाहरण 
कार्यस्थल पर शुरू-शुरू में चुप-चाप काम करने के बाद शर्माजी ने अपनी सर्वाधिक कार्यकुशलता का जलवा दिखाकर सबसे अपना लोहा मनवा लिया।

मूल

अन्य अर्थ

संबंधित शब्द

हिंदी में

अन्य भारतीय भाषाओं में निकटतम शब्द 
तड़क भड़क, शोभा, सौंदर्य, दीप्ति।
शब्दार्थ
जगह एक हिन्दी शब्द है।

उदाहरण 
 घर में हर वस्तु के लिए जगह होना चाहिए और हर वस्तु अपनी ही जगह पर होना चाहिए।

मूल

अन्य अर्थ 
स्थान

संबंधित शब्द

हिंदी में

अन्य भारतीय भाषाओं में निकटतम शब्द 

शब्दार्थ
आंदोलन संगठित सत्ता तंत्र या व्यवस्था द्वारा शोषण और अन्याय किए जाने के बोध से उसके खिलाफ पैदा हुआ संगठित और सुनियोजित अथवा स्वतःस्फूर्त सामूहिक संघर्ष है। इसका उद्देश्य सत्ता या व्यवस्था में सुधार या परिवर्तन होता है। यह राजनीतिक सुधारों या परिवर्तन की आकांक्षा के अलावा सामाजिक, धार्मिक, पर्यावरणीय या सांस्कृतिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए भी चलाया जाता है। उदाहरणस्वरूप चिपको आंदोलन पेड़ों की रक्षा के लिए चलाया गया आंदोलन है।

आंदोलन और संघर्ष 
आंदोलन एक सामूहिक संघर्ष है। किंतु "संघर्ष और आंदोलन एक ही चीज़ नहीं है। संघर्ष रोजमर्रा की जिंदगी का अभिन्न हिस्सा है। वर्गों में बँटे और शोषण पर टिके समाज में व्यक्ति हर रोज अनगिनत रूपों में संघर्ष करते हैं। यह संघर्ष व्यक्ति के सामूहिक या वर्ग संघर्ष का हिस्सा भी होता है। लेकिन, इन सबको आदोलन नहीं कहा जा सकता। आंदोलन, चाहे वह संगठित हो या स्वतःस्फूर्त, संघर्ष के विकास की एक अवस्था है जहाँ संघर्ष का स्वरूप आम हो जाता है; संघर्ष व्यक्तिगत नहीं रह जाता, सामूहिक हो जाता है।

प्रमुख भारतीय आंदोलन

सविनय अवज्ञा आन्दोलन 
 दूसरे नाम: नमक आंदोलन, दांडी मार्च
 समय: 12 मार्च 1930
 मुख्य नेता: मोहनदास करमचंद गाँधी

भारत छोड़ो आन्दोलन 
 शुरुआत: अगस्त १९४२
 मुख्य नेता: मोहनदास करमचंद गांधी
 वजह: तुरंत आज़ादी
 निष्कर्ष: विफल, १९४२ में आंदोलन का दमन

बारडोली सत्याग्रह 
 समय: १९२८
 मुख्य नेता: सरदार वल्लभभाई पटेल
 मुद्दा: नील की खेती और कर
 निष्कर्ष: सफल

असहयोग आन्दोलन 
 समय अन्तराल:सितम्बर १९२० से फ़रवरी १९२२ तक चला
 मुख्य मुद्दे: रोलट एक्ट, जलियावाला बाग काण्ड
 समाप्ति की वजह: चौरी-चौरा काण्ड

संदर्भ सूची

बाहरी कड़ियाँ

इतिहास
समाजशास्त्र
जनता एक हिन्दी शब्द है।

उदाहरण 
२०१२ दिल्ली सामूहिक बलात्कार के प्रति राष्ट्र-व्यापी आन्दोलन नारी-सम्मान के प्रति इस देश की जनता की भड़की भावनाओं का प्रतीक है।

मूल

अन्य अर्थ

संबंधित शब्द

हिंदी में

अन्य भारतीय भाषाओं में निकटतम शब्द 

शब्दार्थ
यह शब्द हिंदी में काफी प्रयुक्त होता है, यदि आप इसका सटीक अर्थ जानते है तो पृष्ठ को संपादित करने में संकोच ना करें (याद रखें - पृष्ठ को संपादित करने के लिये रजिस्टर करना आवश्यक नहीं है)। दिया गया प्रारूप सिर्फ दिशा निर्देशन के लिये है, आप इसमें अपने अनुसार फेर-बदल कर सकते हैं।

उदाहरण 
वह इतना बड़ा ज़ालिम था कि उसने अपने मरते हुए बाप को पानी देने से इंकार कर दिया।

मूल 
अरबी: ظالم

अन्य अर्थ 
क्रूर, निर्दयी, बेदर्द

संबंधित शब्द

हिंदी में

अन्य भारतीय भाषाओं में निकटतम शब्द 

शब्दार्थ
जगन्नाथ (  ) हिन्दू भगवान विष्णु के पूर्ण कला अवतार श्रीकृष्ण का ही एक रूप हैं। इनका एक बहुत बड़ा मन्दिर ओड़िशा राज्य के पुरी शहर में स्थित है। इस शहर का नाम जगन्नाथ पुरी से निकल कर पुरी बना है। यहाँ वार्षिक रूप से रथ यात्रा उत्सव भी आयोजित किया जाता है। पुरी की गिनती हिन्दू धर्म के चार धाम में होती है।

मूर्तियों की उत्पत्ति 

जगन्नाथ से जुड़ी दो रोचक कहानियाँ हैं। पहली कहानी में श्रीकृष्ण अपने परम भक्त राज इन्द्रद्युम्न के सपने में आए और उन्हे आदेश दिया कि पुरी के दरिया किनारे पर पडे एक पेड़ के तने में से वे श्री कृष्ण का विग्रह बनाएँ। राजा ने इस कार्य के लिए बढ़ई की तलाश शुरु की। कुछ दिनो बाद एक रहस्यमय बूढ़ा ब्राह्मण आया और उसने कहा कि प्रभु का विग्रह बनाने की जिम्मेदारी वो लेना चाहता है। लेकिन उसकी एक शर्त थी - कि वो विग्रह बन्द कमरे में बनायेगा और उसका काम खत्म होने तक कोई भी कमरे का द्वार नहीं खोलेगा, नहीं तो वो काम अधूरा छोड़ कर चला जायेगा। ६-७ दिन बाद काम करने की आवाज़ आनी बन्द हो गई तो राजा से रहा न गया और ये सोचते हुए कि ब्राह्मण को कुछ हो गया होगा, उसने द्वार खोल दिया। पर अन्दर तो सिर्फ़ भगवान का अधूरा विग्रह ही मिला और बूढ़ा ब्राह्मण लुप्त हो चुका था। तब राजा को आभास हुआ कि ब्राह्मण और कोई नहीं बल्कि देवों का वास्तुकार विश्वकर्मा था। राजा को आघात हो गया क्योंकि विग्रह के हाथ और पैर नहीं थे और वह पछतावा करने लगा कि उसने द्वार क्यों खोला। पर तभी वहाँ पर ब्राह्मण के रूप में नारद मुनि पधारे और उन्होंने राजा से कहा कि भगवान इसी स्वरूप में अवतरित होना चाहते थे और दरवाजा खोलने का विचार स्वयं श्री कृष्ण ने राजा के दिमाग में डाला था। इसलिए उसे आघात चिंतन करने का कोइ कारण नहीं है और वह निश्चिन्त हो जाए।

दूसरी कहानी महाभारत में से है जो बताती है कि जगन्नाथ के रूप का रहस्य क्या है। माता यशोदा, सुभद्रा और देवकी जी, वृन्दावन से द्वारका आये हुए थे। रानियों ने उनसे निवेदन किया कि वे उन्हे श्री कृष्ण की बाल लीलाओं के बारे में बताएँ। सुभद्रा जी द्वार पर पहरा दे रही थी, कि अगर कृष्ण और बलराम आ जाएंगे तो वो सबको आगाह कर देगी। लेकिन वो भी कृष्ण की बाल लीलाओं को सुनने में इतनी मग्न हो गई, कि उन्हे कृष्ण बलराम के आने का विचार ही नहीं रहा। दोनो भाइयों ने जो सुना, उस से उन्हे इतना आनन्द मिला की उनके बाल सीधे खडे हो गए, उनकी आँखें बड़ी हो गई, उनके होठों पर बहुत बड़ा स्मित छा गया और उनके शरीर भक्ति के प्रेमभाव वाले वातावरण में पिघलने लगे। सुभद्रा बहुत ज्यादा भाव विभोर हो गई थी इस लिए उनका शरीर सबसे ज़्यादा पिघल गया (और इसी लिए उनका कद जगन्नाथ के मन्दिर में सबसे छोटा है)। तभी वहाँ नारद मुनि पधारे और उनके आने से सब लोग वापस आवेश में आएँ। श्री कृष्ण का ये रूप देख कर नारद बोले कि "हे प्रभु, आप कितने सुन्दर लग रहे हो। आप इस रूप में अवतार कब लेंगे?" तब कृष्ण ने कहा कि कलियुग में वो ऐसा अवतार लेंगे और उन्होंने ने कलियुग में राजा इन्द्रद्युम्न को निमित बनाकर जगन्नाथ अवतार लिया।

संदर्भ

इन्हें भी देखें 
 जगरनॉट
 रथरात्रा
 जगन्नाथ मन्दिर, पुरी

बाहरी कड़ियाँ 

 https://web.archive.org/web/20090619060852/http://jagannath.nic.in/
 https://web.archive.org/web/20090611041759/http://rathjatra.nic.in/
 https://web.archive.org/web/20090430175801/http://rathayatra.co.uk/
 https://web.archive.org/web/20110202173204/http://jagannathtemplepuri.com/
 https://web.archive.org/web/20120320103807/http://www.srijangatha.com/?pagename=prasangvash2_13jul2k10 (समन्वय के देवता दारुब्रह्म श्रीजगन्नाथ : डॉ हरेकृष्ण मेहेर)

कृष्ण
कृष्ण के रूप
वैष्णव सम्प्रदाय

मन्दिर
Pankaj का अर्थ प्रायः कमल फूल से होता है।

उदाहरण 
मंदिर के सामने कुंड में हर साल जलज खिल उठे मानो ईश को धन्यवाद देते हों।

मूल 
जल् + अज = जल में जन्म लेने वाला

अन्य अर्थ 
कमल

संबंधित शब्द

हिंदी में 
पंकज, सरोज, नीरज, कमल

अन्य भारतीय भाषाओं में निकटतम शब्द 
स्वभावज या स्वभावजं :जन्म से उत्त्पन्न स्वभाव
नीरज शब्द के अनेक अर्थ हो सकते हैं -

शब्दार्थ
 हिम कमल - चीन देश में उगने वाली एक प्रकार की वनस्पति जिसका प्रयोग औषधि में होता है।
 नीरज - एक प्रकार का फूल जो पानी में खिलता है- कमल

व्यक्ति
 गोपालदास नीरज - हिन्दी कवि और गीतकार
 नीरज वोरा - फ़िल्म व्यक्तित्व
 नीरज चोपड़ा - खिलाड़ी
 नीरज पांडे - फ़िल्म व्यक्तित्व
 नीरज कयाल - कंप्यूटर वैज्ञानिक
 नीरजा भनोट - विमान परिचारिका
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उदाहरण स्वेदज का अर्थ है, स्वेद(पसीने)से पैदा होने वाला, जैसे- पैरों पर पसीना आने पर भी जब उसे साफ नही किया जाता है तब लगभग एक सप्ताह बाद बालों की जड़ के पास अति सूक्ष्म कीड़े पैदा हो जाते है, जो काले रंग के गोल आकार के होते है,इनका पता तब चलता है, जब तेज़ खुजली प्रारंभ हो जाती है।

मूल

अन्य अर्थ

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शब्दार्थ
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मूल 
धैर्य

अन्य अर्थ 
सहन, ढाढस, सांत्वना

उदाहरण 
धीरज, धर्म, मित्र अरु नारी। आपत काल परखिए चारि॥

संबंधित शब्द

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शब्दार्थ
धैर्य () कठिन परिस्थितियों में व्यक्ति की सहनशीलता की अवस्था है जो उसके व्यवहार को क्रोध या खीझ जैसी नकारात्मक अभिवृत्तियों से बचाती है। दीर्घकालीन समस्याओं से घिरे होने के कारण व्यक्ति जो दबाव या तनाव अनुभव करने लगता है उसको सहन कर सकने की क्षमता भी धैर्य का एक उदाहरण है। वस्तुतः धैर्य नकारात्मकता से पूर्व सहनशीलता का एक स्तर है। यह व्यक्ति की चारित्रिक दृढ़ता का परिचायक भी है।

वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य 
विकासात्मक मनोविज्ञान और संज्ञानात्मक तंत्रिकाविज्ञान में धैर्य का अध्ययन निर्णयन समस्या के रूप में किया जाता है, जहाँ चयन इस बात का होता है कि व्यक्ति तात्कालिक या लघु-आवधिक तुच्छ पुरस्कार को वरीयता देता है या दीर्घकालिक अधिक मूल्यवान प्रतिदान को। विकल्प दिये जाने पर सभी प्राणियों, जिनमें सामाजिक प्राणी मनुष्य भी शामिल है, का झुकाव दीर्घावधिक लाभ के बजाय लघु-आवधिक लाभ की तरफ होता है। हालांकि यह झुकाव अक्सर दीर्घावधिक प्रतिदान के साथ जुड़े बेहतर लाभ के बावजूद होता है।

धार्मिक परिप्रेक्ष्य

सन्दर्भ

इन्हें भी देखें
संयम
आत्मनियंत्रण

बाहरी कड़ियाँ

आध्यात्म
मनोविज्ञान
पारिभाषिक शब्दावली
अधीर शब्द हिंदी भाषी शब्द है जिसका शब्दिक अर्थ है धर्यरहित या परेशान उदाहरण -जैसे औपनिवेशिक शासन व्यवस्था जनजातिय लोग को अधिक अधीर एवं हिंसक बना दिया था क्योंकि औपनिवेशिक शासन द्वारा उनकी आत्मनिर्भर व्यवस्था में अतिक्रमण किया जा रहा था

उदाहरण

मूल

अन्य अर्थ

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अधीर
व्यस्त का अर्थ मसरूफ़ है।

उदाहरण 
मैं अपने कार्यालय में काफी व्यस्त रहता हूँ।

मूल

अन्य अर्थ

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शब्दार्थ
किसी एक ही परिवार से एक के बाद एक जन्म लेने वाले व्यक्तियों को वंश कहते हैं।

अफ्रीका के वंश

चाड 
 Duguwa dynasty (c. 700 – c. 1075)
 Sayfawa dynasty (c. 1075 – 1846)

मिस्र 
 1st dynasty (c. 3050 – 2890 BC)
 2nd dynasty (2890 – 2686 BC)
 3rd dynasty (2686 – 2613 BC)
 4th dynasty (2613 – 2498 BC)
 5th dynasty (2498 – 2345 BC)
 6th dynasty (2345 – 2181 BC)

 7th and 8th dynasties (2181 - 2160 BC)
 9th dynasty (2160 – 2130 BC)
 10th dynasty (2130 – 2040 BC)
 11th dynasty (2134 – 1991 BC)
 12th dynasty (1991 – 1803 BC)
 13th dynasty (1803 – 1649 BC)
 14th dynasty (1705 – 1690 BC)
 15th dynasty (1674 – 1535 BC)
 16th dynasty (1660 – 1600 BC)
 17th dynasty (1650 – 1549 BC)
 18th dynasty (1549 – 1292 BC)
 19th dynasty (1292 – 1186 BC)
 20th dynasty (1186 – 1069 BC)
 21st dynasty (1069 – 945 BC)
 22nd dynasty (945 – 720 BC)
 23rd dynasty (837 – 728 BC)
 24th dynasty (732 – 720 BC)
 25th dynasty (732 – 653 BC)
 26th dynasty (672 – 525 BC)
 Achaemenid dynasty (525 – 404 BC)
 28th dynasty (404 – 398 BC)
 29th dynasty (398 – 380 BC)
 30th dynasty (380 – 343 BC)
 Achaemenid dynasty (343 – 332 BC)
 Argead dynasty (332 – 309 BC)
 Ptolemaic Dynasty (305 – 30 BC)
 Julio-Claudian Dynasty (27 BC – AD 68)
 Flavian Dynasty (69 – 96)
 Nervan-Antonian Dynasty (96 – 192)
 Severan Dynasty (193 – 235)
 Constantinian dynasty (303 – 336)
 Valentinian Dynasty (364 – 457)
 House of Theodosius from 379
 Leonid dynasty (457 – 518)
 Justinian Dynasty (518 – 602)
 Sassanian dynasty
 Heraclian Dynasty (602 – 695 and 705 – 711)
 Rashidun Caliphate
 Umayyad Caliphate
 Abbasid Caliphate
 Mamelukes
 Ottoman Sultanate
 Muhammad Ali Dynasty (1805 – 1953)

इथियोपिया 
 Aksumite Empire
 Zagwe dynasty (c. 900 – 1270)
 Solomonic dynasty (1270 – 1974)
 Mudaito Dynasty (1734 –वर्तमान)

गीनिया (Guinea) 
 Keita dynasty (c. 1200 – 1670)

मोरक्को 
 Idrisid dynasty (789 – 974)
 Maghrawa dynasty (987 – 1070)
 Almoravid dynasty (1073 – 1147)
 Almohad dynasty (1147 – 1269)
 Marinid dynasty (1258 – 1420)
 Wattasid dynasty (1420 – 1554)
 Saadi dynasty (1554 – 1659)
 Alaouite dynasty (1666 onwards)

नाइजेरा 
 Eri dynasty of the Igbo and Igala peoples
 Eweka dynasty of Benin (a cadet branch of the Ooduan dynasty) 
 Ibn Fodio dynasty of Sokoto and Gwandu
 Jaja dynasty of Opobu
 Modibo Adama dynasty of Adamawa
 el-Kanemi dynasty of Bornu
 Ooduan dynasty of Ife, Egba, Ketu, Sabe, Oyo, Ijero and the Ilas
 Asodeboyede dynasty of Akure (a cadet branch of the Ooduan dynasty)
 Ologun Kutere dynasty of Lagos (a cadet branch of the Ooduan dynasty)
 Sayfawa dynasty of Bornu

सोमालिया 
 Gareen Dynasty
 Walashma Dynasty
 Gobroon Dynasty
 Gerad Dynasty
 Hobyo Dynasty

दक्षिण अफ्रीकाS 
 Zulu Royal Family
 Rain Queen dynasty 
 Transkeian dynasty of the Thembus (which counts Nelson Mandela as a non-regnal member)

एशिया के वंश

अफगानिस्तान 
 दुर्रानी साम्राज्य (1747 – 1823 and 1839 – 1842)
 Barakzai Dynasty (1818 – 1839, 1842 – 1929 and 1929 – 1973)
 Usurper King (January 17, 1929 - October 13, 1929)

भूटान 
 House of Wangchuck (1907–वर्तमान)

भारत 
 गुर्जर (300 - 1236 CE) 
 नायर (18th century AD)
 नंद वंश (424 – 321 BCE)
 मौर्य वंश (321 – 184 BCE)
 शुंग वंश (185 – 73 BCE)
 जाडेजा 
 कण्व वंश (75 – 26 BCE)
 सातवाहन वंश (230 BCE – 220 CE)
 चेर राजवंश (300 BCE – 1200 CE)
 चोल वंश (278 BCE – 1279 CE)
 पाण्ड्य राजवंश (300 BCE – 1345 CE)
 पल्लव वंश (250 BCE – 800 CE)
 कुषाण वंश (60 – 240 CE)
 राजगोंड राजवंश (157 – 1751 CE)
 वाकाटक  (250 – 500 CE)
 गुप्त वंश (280 – 550 CE)
 पश्चिम गंग वंश (350 – 1000 CE)
 हिन्दू शाही (6th to 12th CE)
 चालुक्य वंश (6th to 12th CE)
 चौहान वंश    (600 -1194 EC)
 गुर्जर-प्रतिहार राजवंश (650 – 1236 CE)
 पाल वंश (750 – 1174 CE)
 राष्ट्रकूट वंश (753 – 982 CE)
 तिब्बती साम्राज्य (7th to the 11th CE)
 परमार राजवंश (800 – 1327 CE)
 यादव  (850 – 1334 CE)
 सोलंकी वंश (942 – 1244 CE)
 होयसल राजवंश (1040 – 1346 CE)
 सेन वंश (1070 – 1230 CE)
 पूर्वी गंगवंश (1078 – 1434 CE)
 काकतीय वंश (1083 – 1323 CE)    
 रेड्डी राजवंश  (1323 –  1448 CE)    
 आहोम साम्राज्य (1228 – 1826 CE)
 दिल्ली सल्तनत (1206 – 1526 CE)
 विजयनगर साम्राज्य (1336 – 1646 CE)
 मुगल वंश (1526 – 1803 CE)
 मराठा साम्राज्य (1674 – 1818 CE)
 धार रियासत (1730–1947 CE)
 तोमर वंश
 सिसोदिया (राजपूत)
 त्रवनकोर
 नागवंशी गोत्र कश्यप

चीन 
 Five Emperors (2852 – 2205 BC)
 Xia Dynasty (2100 – 1600 BC)
 Shang Dynasty (1600 – 1046 BC)
 Zhou Dynasty (1046 – 256 BC)
 Warring States Period (475 – 221 BC) (Several of the Dynasties in the Warring States were descended from the Zhou royal family)
 State of Song (part of warring states) The rulers of the state of Song were descendants of the Shang royal family.
 State of Yue (part of warring states) The kings of Yueh claimed descent from the royal family of the Xia dynasty.
 State of Wu Same royal family as Zhou dynasty
 State of Jin Same royal family as Zhou dynasty
 State of Ba (barbarian state, non sinicized)
 Qin Dynasty (221 – 206 BC) (The royal family of Qin ruled the State of Qin during warring states) (They also claimed descent from one of the Five emperors, Zhuanxu)
 Han Dynasty (206 BC – 220)
 Minyue - same royal family as state of yueh- they fled when conquered by Chu and established Minyue, Min yue coexisted with the Warring states period, Qin, and Han dynasty until han conquered it.
 Nanyue (South Yue) - Proto-Cantonese state founded by Qin general Zhao Tuo. (It is also Vietnam's Trieu Dynasty.)
 Xin Dynasty (AD 9 – 23) Xin dynasty inturepted the han dynasty, splitting it into east and west periods
 Three Kingdoms (220 – 265) (The emperor of Shu was a descandant of the Han Dynasty royal family)
 Jin Dynasty (265–420)
 Northern Wei (controlled northern China to the Huai river) (386 – 534)
 Southern and Northern Dynasties (420 – 589)
 Sui Dynasty (581 – 618)
 Tang Dynasty (618 – 907) (The Tang Emperors were members of the Li family, descended from a ruler in the Southern and Northern Dynasties)
 Second Zhou Dynasty (690 – 705) Interrupted Tang dynasty
 Liao Dynasty (Khitan) (907 – 1125) (controlled the 16 prefectures)
 Five Dynasties and Ten Kingdoms Period (907 – 960)
 Song Dynasty (960 – 1279)
 Jin Dynasty (Jurchen) (controlled northern China to the Huai river) (1115–1234)
 Yuan Dynasty (Mongol) (1271 – 1368)
 Ming Dynasty (1368 – 1644)
 Shun Dynasty (1644)
 Qing Dynasty (Manchu) (1644 – 1912)
 Kingdom of Tungning (Taiwan, with Han Chinese rulers) (1662 – 1683) 
 Empire of China (1915 – 1916)

मध्य एशिया 

 Tamerlane Timurid
 Ghaznavid Empire
 Ghurid Empire
 Ottoman Empire
 Seljuq Khanate
 Mughal Empire Mughulistan
 Durrani Empire
 Chagatai Khanate
 Hotaki Dynasty
 Suri Dynasty
 Mamluk Sultanate
 Khilji Dynasty
 Tughlaq Khanate
 Lodhi Dynasty
 Khwarazm Dynasty
 Samanid Dynasty

इजराइल 
 Davidic Dynasty
 Hasmonean Dynasty
 Achaemenid dynasty (343 – 332 BC)
 Argead dynasty (332 – 309 BC)
 Ptolemaic Dynasty (305 – 30 BC)
 Herodian Dynasty
 Julio-Claudian Dynasty (27 BC – AD 68)
 Flavian Dynasty (69 – 96)
 Nervan-Antonian Dynasty (96 – 192)
 Severan Dynasty (193 – 235)
 Constantinian dynasty (303 – 336)
 Valentinian Dynasty (364 – 457)
 House of Theodosius from 379
 Leonid dynasty (457 – 518)
 Justinian Dynasty (518 – 602)
 Heraclian Dynasty (602 – 695 and 705 – 711)

जापान 
 Yamato dynasty, Imperial house of Japan (660 BC–वर्तमान, with power fluctuating between absolute ruler to ceremonial figurehead to constitutional monarch)

Ryūkyū 
 Shunten Dynasty (1187 – 1259)
 Eiso dynasty (1260 – 1349)
 Hokuzan (1314 – 1419)
 Chuzan (1314 – 1429)
 Nanzan (1314 – 1429)
 First Shō Dynasty (1406 – 1469)
 Second Shō Dynasty (1469 – 1879)

कोरिया 
 Gojoseon (2333 – 108 BCE)
 Proto–Three Kingdoms (108 – 57 BCE)
 Three Kingdoms of Korea (57 BCE – 668)
 Silla (57 BCE – 935)
 Goguryeo (37 BCE – 668)
 Baekje (18 BCE – 660)
 Gaya (42 CE – 562)
 North-South States (698 – 935)
 Unified Silla (668 – 935)
 Balhae (698 – 926)
 Later Three Kingdoms (892 – 936)
 Goryeo Dynasty (918 – 1392)
 Joseon Dynasty (1392 – 1897)
 Korean Empire (1897 – 1910)

मालदीव 
 House of Theemuge (1117 – 1388)
 Hilaalee dynasty (1388 – 1558)
 (1558 – 1573) Interregnum
 Utheemu dynasty (1573 – 1692)
 (1692 – 1701) Kings who do not belong to a particular dynasty.
 Isdhoo dynasty (1701 – 1704)
 Dhiyamigili dynasty (1704 – 1757)
 Huraa dynasty (1757 – 1766)
 Dhiyamigili dynasty (1766 – 1773)
 Huraa dynasty (1773 – 1953)
 (1953 – 1953) Republic (President Muhammad Amin Didi).
 Huraa dynasty (1953 – 1968)
 (1968 – 1978) Republic (President Ibrahim Nasir).
 (1978 – 2008) Republic (President Maumoon Abdul Gayoom).

मलेशिया 
 White Rajahs (1841 – 1946)

मंगोलिया 
 मंगोल साम्राज्य (1206 – 1368)
 Yuan Dynasty (1271 – 1368)
 Golden Horde (1240s – 1502)
 Ilkhanate (1256 – 1335)
 Chagatai Khanate (1225 – 1687)
 Northern Yuan Dynasty (1368 – 1634)
 Qing Dynasty (1644 – 1912)

म्यांमार (बर्मा) 
 Toungoo dynasty (1486 – 1752)
 Konbaung dynasty (1752 – 1885)

फिलीपींस 

Royal Families
 Malay Dynasties
 The Datu Puti Lineage (Ruled the defunct Confederation of Madya-as) (1200s – 1565)

 हिन्दू वंश
 The Lakandula Dynasty (Ruled the defunct Kingdom of Tondo) (1150 – 1589)
 The House of Tupas (Ruled the defunct Rajahnate of Cebu) (up to 1565)
 The House of Sri Bata Shaja(Ruled the defunct Rajahnate of Butuan) (989 – 1586)

 मुस्लिम वंश
 The Ud-Din Royal Hashemite Family (A dynasty which ruled the Maguinadanao Sultanate) (1480 – 1830)
 The Kiram Royal Hashemite Family (Rules the Sulu Sultanate) (1823 – Present)

श्री लंका

उत्तर 
 Polonnaruwan Dynasty
 Aryacakravartese Dynasty
 Ceilão Dynasty
 Zeylan Dynasty
 Kandy Dynasty
 Ceylon Dynasty
 Dominion Dynasty
 First Sinhalese Dynasty
 Eelamese Dynasty
 Second Sinhalese Dynasty

दक्षिण 
 Raigaman Dynasty
 Kotte Dynasty
 Sitawakan Dynasty
 Kandy Dynasty
 Ceylon Dynasty
 Dominion Dynasty
 Sinhalese Dynasty

Saudi Arabia 
 House of Saud (1932–वर्तमान)

तिब्बत 
 Yarlung Dynasty (up to 842)
 Sakya lama (13–14th century, but subordination to the Mongol Yuan Dynasty)
 Phagmodrupa Dynasty
 Dalai Lama (1492 – 1959, but subordination to Manchu Qing Dynasty between 1720 and 1912)

थाईलैण्ड 
 Hari Pun Chai dynasty (663 – 1293)
 Phra Roung dynasty (Sukhothai Kingdom) (1237 – 1438)
 Mangrai dynasty (1261 – 1578)
 Eu Thong dynasty (1350 – 1370), (1388 – 1409)
 Suphanabhumi dynasty (1370 – 1350), (1409 – 1569)
 Phra Roung Dynasty (Ayutthaya Kingdom) (1569 – 1629)
 Prasart Thong dynasty (1629 – 1688)
 Bann Plu Luang dynasty (1688 – 1767)
 Tipchakratiwong dynasty (Seven princes dynasty) (Lanna Kingdom) (1732 – 1932) 
 Thonburi dynasty (1767 – 1782)
 Chakri dynasty (1782 onwards)

तुर्की 
 Seljuq Dynasty (1077 – 1307)
 Ottoman Dynasty (1281 – 1923)

वियतनाम 
 Hồng Bàng Dynasty (2919 – 258 BC)
 Thục Dynasty (257 – 207 BC)
 Triệu Dynasty (207 – 111 BC)
 Han Dynasty (Chinese) (111 BC – 39 AD and 43 – 220)
 Trưng Sisters (40 – 43)
 Eastern Wu Dynasty (Chinese) (229 – 280)
 Jin Dynasty (Chinese) (280 – 420)
 Southern Qi Dynasty (Chinese) (479 – 502)
 Liang Dynasty (Chinese) (502 – 544)
 Anterior Lý Dynasty (544 – 602)
 Sui Dynasty (Chinese) (602 – 618)
 Tang Dynasty (Chinese) (618 – 905)
 Khúc Family (906 – 930)
 Ngô Dynasty (939 – 967)
 Đinh Dynasty (968 – 980)
 Prior Lê Dynasty (980 – 1009)
 Lý Dynasty (1009 – 1225)
 Trần Dynasty (1225 – 1400)
 Hồ Dynasty (1400 – 1407)
 Posterior Trần Dynasty (1407 – 1413)
 Ming Dynasty (Chinese) (1414 – 1427)
 Later Lê Dynasty (1428 – 1527 and 1533 – 1788)
 Mạc Dynasty (1527 – 1677)
 Trịnh Lords (1545 – 1787)
 Nguyễn Lords (1558 – 1777)
 Tây Sơn Dynasty (1778 – 1802)
 Nguyễn Dynasty (1802 – 1945)
 House of Bonaparte (European) (1870)

चम्पा 
 1st dynasty (192 - 336) 
 2nd dynasty (336 - 420) 
 3rd dynasty (420 - 529) 
 4th dynasty (529 - 758) 
 5th dynasty (758 - 854) 
 6th dynasty (854 - 989) 
 7th dynasty (989 - 1044) 
 8th dynasty (1044–1074) 
 9th dynasty (1074–1139) 
 10th dynasty (1139–1145) 
 11th dynasty (1145–1190) 
 12th dynasty (1190–1318) 
 13th dynasty (1318–1390)
 14th dynasty (1390–1458) 
 15th dynasty (1458–1471) 
 vacant (1471–1695)
 Dynasty of Po Saktiraidaputih (1695–1822)

यूरोप के वंश

Austria 
 House of Babenburg (976–1230)
House of Habsburg (1273-1918)

Albania 
 Progon Dynasty (1190–1216)
 Angevin (1272–1368)
 Kastrioti (1444–1468)
 Wied (1914)
 Zogu (1928–1939)

Armenia 
 Orontid Dynasty
 Artaxiad Dynasty or the Artashesi Dynasty (189 BC-12 AD)
 Arsacid Dynasty or the Arshakuni Dynasty (54-428)
 Bagratuni Dynasty or the Bagratid Dynasty of Armenia (885-1045)
 Rubenid Dynasty or the Armenian Kingdom of Cilicia (1080–1225)

Belgium 
 House of Saxe-Coburg and Gotha (1831–वर्तमान)

Bohemia 
 House of Premyslid (870–1306)
 House of Luxembourg (1310–1419)
 House of Habsburg (1437–1457, 1526–1780)
 House of Wittelsbach (1619–1620, 1741–1743)
 House of Habsburg–Lorraine (1780–1918)

Bosnia 
 House of Boričević (1154–1163, 1536-)
 House of Kulinić (1163–1250)
 House of Kotromanić (1250–1463)
 House of Berislavić, deposed (1463–1536)

Bulgaria 
 House of Dulo (632 - 753)
 Krum's dynasty (777 - 976/997)
 Cometopuli dynasty (976/997 - 1018)
 House of Asen (1187–1280)
 House of Terter (1280–1331)
 House of Sratsimir (1331–1422)
 Battenberg family (1878–1886)
 House of Saxe-Coburg and Gotha (1886–1947)

Barbarians

Bavarii 
 Agilolfing Dynasty

Franks 
 Merovingian Dynasty (481-751)
 Carolingian Dynasty (751-843)
 Arnulfings or Pippinids, mayors of the palaces

Huns 
This is a list of rulers of the Huns.
Period 	Ruler
 Vund c. 360 
 Balamber 360 - 378 
 Baltazár (Alypbi) 378 - 390 
 Uldin (Khan of the Western Huns) 390 - 410
 Donatus (Khan of the Eastern Black Sea Huns & beyond) 410 - 412
 Charaton (Aksungur) 412 - 422
 Octar[1] 422 - 432
 Rugila 432-434
 Bleda with Attila c. 434-c. 445
 Attila "the Hun" c. 434-453
 Ellac 453-c. 455
 Tuldila fl. c. 457
 Dengizich (Sabirs attack c.460-463) ?-469 with Hernach/BelkErmak 	
 Hernach/BelkErmak[2] 469-503
 House of Dulo Bulgaria (390-503) A Nominalia of the Bulgarian khans genealogy claims that the Dulo clan is descended from Attila the Hun.

Scirii 
 Edeko
 Odoacer (435–493), was the 5th-century King of Italy

Avars

Lombards
See Early kings of the Lombards.
 Lething Dynasty (until early 6th century)
 Gausian Dynasty (546-572)
 Bavarian Dynasty (616-712)

Ostrogoths 
 Amal Dynasty (before 474-536)

Suebi 
 Suebic Dynasty (409-585)

Vandals 
 Hasdingi (before 407-534)

Visigoths 
 Balthi Dynasty (395-531)

Byzantine Empire 
 Constantinian dynasty (303-336)
 Valentinian Dynasty (364-457)
 House of Theodosius from 379
 Leonid dynasty (457-518)
 Justinian Dynasty (518-602)
 Heraclian Dynasty (602-695 and 705-711)
 Isaurian Dynasty (717-802)
 Phrygian Dynasty (820-867)
 Macedonian Dynasty (867-1056)
 Komnenid Dynasty (1057–1059 and 1081–1185)
 Doukid Dynasty (1059–1081)
 Angelid Dynasty (1185–1204)
 Laskarid Dynasty (1204–1261), in exile in Nicaea
 Palaiologid Dynasty (1261–1453)

Croatia 
 Trpimirović Dynasty (845-1091)
 Árpád Dynasty (c.1102-1301)
 Přemyslid Dynasty (1301–1305)
 House of Wittelsbach (1305–1308)
 Capetian Dynasty, House of Anjou (1308–1395)
 House of Luxemburg (1387–1437)
 Habsburg Dynasty (1437–1457, 1526-1918)
 Jagiellonian Dynasty (1440–1526)
 Zápolya Dynasty (1526–1571)
 Habsburg Dynasty (1526-1918)

Denmark 
 see List of Danish monarchs (-1412)
 House of Oldenburg (1448-1863)
 House of Schleswig-Holstein-Sonderburg-Glücksburg (1863 to the present)

France 
 Carolingian Dynasty (843-987)
 Capetian Dynasty (987-1792, 1814–1848)
 Direct Capetians (987-1328)
 House of Valois (1328–1589)
 Direct House of Valois (1328–1498)
 House of Valois-Orléans (1498–1515)
 House of Valois-Angoulême (1515–1589)
 House of Bourbon (1589–1792 and 1814–1848)
 House of Bourbon-Vendôme (1589–1792, 1814–1830)
 House of Bourbon-Orléans (1830–1848)
 Bonaparte Dynasty (1804–1814 and 1852–1870)

Georgia 
 Pharnabazid Dynasty (299-90 BC, 30BC-189 AD)
 Artaxiad Dynasty (90-30 BC)
 Arsacid Dynasty (189-284 AD)
 Chosroid Dynasty (284-580, 627-684)
 Guaramid Dynasty (588-627, 684-748, 779-786)
 Nersianid Dynasty (748-780)
 Bagratid (Bagrationi) dynasty (813-1810)

Germany 
 Carolingian Dynasty (843-911)
 Conradines (911-918)
 Ottonian Dynasty (919-1024)
 Salian Dynasty or Franconian Dynasty (1024–1125)
 Supplinburger Dynasty (1125–1137)
 House of Hohenstaufen (1137–1254)
 House of Habsburg (1273–1291, 1298–1308, and 1438-1740)
 House of Lorraine (1745–1806)
 House of Nassau (1292–1298)
 House of Luxemburg (1308–1313, 1347–1400, and 1410–1437)
 House of Wittelsbach (1314–1347, 1400–1410, and 1742–1745)
 House of Hohenzollern (1871–1918)

Bavaria 
 Liutpolding Dynasty 889-947
 Ottonian Dynasty 947-1017
 House of Luxembourg 1017-1026, 1039–1047
 Salian Dynasty 1026-1039, 1053–1061
 House of Welf 1070-1138, 1156–1180
 House of Babenberg 1138-1156
 House of Wittelsbach 1180-1918

Saxony 
 Liudolfing Dynasty 843-961
 Billung Dynasty 961-1106
 Supplinburger Dynasty 1106-1127
 House of Welf 1127-1138, 1142–1180
 Ascanian Dynasty 1138-1142, 1180–1422
 Wettin Dynasty 1422-1918

Hungary 
 Árpád Dynasty (c.895-1301)
 Samuel Aba of Hungary Aba - Árpád Dynasty (1038–1044) 
 Přemyslid Dynasty (1301–1305)
 House of Wittelsbach (1305–1308)
 Capetian Dynasty, House of Anjou (1308–1395)
 House of Luxemburg (1387–1437)
 Habsburg Dynasty (1437–1457, 1526-1918)
 Jagiellonian Dynasty (1440–1526)
 Zápolya Dynasty (1526–1571)
 Habsburg Dynasty (1526-1918)

Monaco 
 House of Grimaldi which is actually Italian in origin.

Montenegro 
 Vojislavljević Dynasty (c. 7th century - 1186)
 Nemanjić Dynasty (1186–1355)
 तीBalšić Dynasty (1356–1435)
 Crnojević Dynasty (1435–1516)
 Petrović-Njegुoš Dynasty (1696–1918)
 Karađorđević Dynasty (1918–1941)

Iberia

Aragon 
 Jiménez Dynasty (1035–1162)
 House of Barcelona (1162–1410)
 House of Trastámara (1412–1516)
 House of Habsburg (1516–1700 and 1701–1707)

Asturias 
 Peláyez Dynasty (718-739)
 Pérez Dynasty (739-925)

Barcelona 
 House of Barcelona (878-1410)
 House of Trastámara (1412–1516)
 House of Habsburg (1516–1700 and 1701–1714)
 House of Bourbon (1714–1716)

Castile 
 House of Lara (930-1032), counts
 Jiménez Dynasty (1035–1126), kings
 House of Burgundy (1126–1369)
 House of Trastámara (1369–1516)
 House of Habsburg (1516–1700)

León 
 Pérez Dynasty (910-1037)
 Jiménez Dynasty (1037–1126)
 House of Burgundy (1126–1369)
 House of Trastámara (1369–1516)
 House of Habsburg (1516–1700)

Navarre 
 House of Íñiguez (824-905)
 Jiménez Dynasty (905-1234)
 House of Champagne (1234–1305)
 House of Capet (1284–1349)
 House of Évreux (1328–1441)
 House of Trastámara (1425–1479)
 House of Foix (1479–1516)
 House of Albret (1483–1572)
 House of Bourbon (1572–1620)

Portugal 
 House of Vímara Peres (868-1071), counts
 House of Burgundy or Afonsine Dynasty (1093–1383), counts until 1139, then kings
 House of Aviz or Joannine Dynasty (1385–1580)
 House of Aviz-Beja (1495–1580)
 House of Habsburg or Philippine Dynasty (1580–1640)
 House of Braganza or Brigantine Dynasty (1640–1910)
 House of Braganza-Saxe-Coburg and Gotha (1853–1910)

Spain

Before the unification of Castile and Aragon 
 House of Trastámara (1492–1516)
 House of Habsburg (1516–1700)
 House of Bourbon (1700–1714) (Disputed during the War of the Spanish Succession)

After the unification of Castile and Aragon 
 House of Bourbon (1714–1868, 1874–1931, and 1975 to the present)
 House of Bonaparte (1808–1813)
 House of Savoy (1871–1873)

Ireland 
 Fir Ol nEchmacht
 Dal Fiachrach Suighe
 The Connachta
 Uí Fiachrach
 Uí Néill
 Eóganachta
 Uí Dúnlainge
 Uí Cheinnselaig
 Dál Riata
 Dál nAraidi
 Dál Fiatach
 Clann Cholmáin
 Síl nÁedo Sláine
 Cenél nEógain
 Cenél Conaill
 Uí Briúin Bréifne
 Dál gCais
 MacDermot
 Ó Neill
 O'Donnell (O Domhnaill)
 O Connor Sligo
 O'Conor Don
 O'Brien

Italy 
 House of Savoy (1861–1946)

Nice–Savoy–Piedmont–Sardinia 
 House of Savoy (1032–1861)
 House of Bonaparte (1860–1870; Nice and Savoy only)

Tuscany 
 House of Boniface (812–931)
 House of Boso (931–1001)
 House of Hucpold (1004–1011)
 House of Canossa (1027–1115)
 House of Medici (1434–1737)
 House of Lorraine (1737–1765)
 House of Habsburg–Lorraine (1765–1801, 1801–1859)
 House of Bourbon–Parma (1801–1807)

Parma 
 House of Farnese (1514–1731)
 House of Bourbon–Parma (1731–1735, 1748–1802, 1848–1859)
 House of Habsburg (1735–1748)
 House of Habsburg–Lorraine (1814–1847)

Modena and Reggio 
 House of Este (940–1796)
 House of Habsburg–Este (1814–1859)

Mantua 

 House of Gonzaga

Milan 

 House of Sforza
 House of Habsburg

Lucca 

 House of Bourbon

Netherlands 
 House of Orange (1772- to the present)

Norway 
 Fairhair Dynasty (890-1319)
 House of Lade
 House of Schleswig-Holstein-Sonderburg-Glücksburg (1905 to the present)

Poland 
 Piast Dynasty (9th century-1296 and 1306–1370)
 Přemyslid Dynasty (1291–1306)
 Capetian Dynasty, House of Anjou (1370–1399)
 Jagiellonian Dynasty (1386–1572 and 1575–1586)
 Valois Dynasty (1573–1574)
 House of Báthory (1576–1586)
 House of Vasa (1587–1668)
 House of Wiśniowiecki (1669–1673)
 House of Sobieski (1674–1696)
 Wettin Dynasty (1697–1706, 1709–1733 and 1736–1764)
 House of Leszczyński (1704–1709 and 1733–1736)
 House of Poniatowski (1764–1795)

Roman Empire 
 Julio-Claudian Dynasty (27 BC-AD 68)
 Flavian Dynasty (69-96)
 Nervan-Antonian Dynasty (96-192)
 Severan Dynasty (193-235)
 Constantinian dynasty (303-363)
 Valentinian Dynasty (364-457)
 House of Theodosius from 379

Romania 
 House of Hohenzollern-Sigmaringen (1866–1947)

Russia 
 House of Rurikovich (862-1598, 1606–1610)
 House of Romanov (1613–1762)
 House of Holstein-Gottorp-Romanov, called Romanov (1762–1917)

Serbia 
 House of Vlastimirović (610-960)
 House of Vojislavljević (1034–1186)
 House of Nemanjić (1166–1371)
 House of Lazarević (1371–1427)
 House of Branković (1427–1502)
 House of Karađorđević (1811–1813, 1842–1858 and 1903–1941)
 House of Obrenović (1815–1842 and 1858–1903)

Sweden 
 House of Uppsala (970-1060)
 House of Stenkil (1060–1130)
 House of Sverker (1130–1222), interspersed with House of Eric
 House of Eric (1156–1250), interspersed with House of Sverker
 House of Bjälbo or Folkung Dynasty (1248–1387)
 House of Vasa (1521–1654)
 House of Wittelsbach or House of Palatinate–Zweibrücken-Kleeburg (1654–1720)
 House of Hesse (1720–1751)
 House of Holstein-Gottorp (1751–1818)
 House of Bernadotte (1818 to the present)

Two Sicilies

Sicily 
 House of Hauteville (1071–1198), counts until 1130
 House of Hohenstaufen (1194–1266)
 House of Capet, House of Anjou (1266–1282)
 House of Barcelona (1282–1410)
 House of Trastámara (1412–1516)
 House of Habsburg (1516–1700 and 1720–1735)
 House of Bourbon (1700–1713)
 House of Savoy (1713–1720)
 House of Bourbon (1735–1861)
 (As a region of the Kingdom of Italy.) House of Savoy (1861–1946)

British Isles (under English rule)

England 
 House of Wessex (802-1016 and 1042–1066)
 House of Denmark (1013–1014 and 1016–1042)
 Norman Dynasty (1066–1154)
 Plantagenet Dynasty (1154-1485)
 House of Anjou (1154–1399)
 House of Lancaster (1399–1461 and 1470–1471) (Throne merged with Irish)
 House of York (1461–1470 and 1471–1485)
 House of Tudor (1485–1603)
 House of Stuart (1603–1714) (Throne merged with Scotland)

Ireland 
 Crowley
 Burke
 Clanricarde
 Plantagenet Dynasty (1154-1485)
 House of Anjou (1154–1399)
 House of Lancaster (1399–1461 and 1470–1471) (Throne merged with English)

Scotland 
 House of Alpin (843-1034)
 House of Dunkeld (1034–1040, 1058–1286)
 House of Moray (1040–1058)
 House of Baliol (1292–1296) (see Belgium, Flanders)
 Plantagenet Dynasty
 House of Bruce (1306–1371)
 House of Stewart (1371-1707) (Throne Merged with English)

Kingdoms after the Union of the Crowns (1603-1707) 
The crown of the Kingdom of England and Ireland merged with that of the Kingdom of Scotland to form a personal union between England-Ireland and Scotland (the former a personal union itself)
 House of Stuart (1603–1707)

Personal Union between Great Britain and Ireland (1707-1801) 
 House of Stuart (1707–1801)
 House of Hanover (1714–1801)

United Kingdom of Great Britain and Ireland (1801-1921) 
 House of Hanover (1801–1901)
 House of Saxe-Coburg-Gotha (1901–1910)

Personal Union of the UK [of GB and NI] and several other Irish states (1921-1949) 
 House of Windsor (1921–1949)

UK [of GB and NI] (Without the personal union with Ireland) (1949–वर्तमान) 
 House of Windsor (1949–वर्तमान)

उत्तरी अमेरिका

हैती 
 Dessalines Dynasty (1804–1806)
 Christophe Dynasty (1811–1820)
 Soulouque Dynasty (1849–1859)

मैक्सिको 
 House of Iturbide (1822–1823)
 House of Habsburg (1864–1867)

ओसीनिया

हवाई 
 Kingdom of Hawaii (1795–1810)
 Kamehameha Dynasty (c.1795-1872)
 Kalākaua Dynasty (c.1874-1893)
 Kawananakoa Dynasty (c.1868-?)
 Kalokuokamaile Dynasty (c.1860-?)

न्यू जीलैण्ड माओरी (New Zealand Māori) 
 Te Wherowhero Dynasty (1856 to the present)

ताहिती (Tahiti) 
 Pōmare Dynasty (1788–1880)

टोंगा (Tonga) 
 Tu'i Tonga Dynasty (c. 900-1865)
 Tupou Dynasty (1875 to the present)

दक्षिण अमेरिका

Kingdom of Araucania and Patagonia 
 Tounes dynasty (1860–1862)

ब्राजील 
 House of Braganza (1822–1889)

Inca Empire 
 Hurin dynasty (1197 - c.1350)
 Haran dynasty (c.1350 - 1572)

व 

Though in elected governments rule does not pass automatically by inheritance, political power often accrues to generations of related individuals even in Republics. Eminence, Influence, familiarity, tradition, genetics, and even nepotism may contribute to this phenomenon.

Family dictatorships are a slightly different concept, where political power passes within a family due to the overwhelming authority of the leader, rather than informal power accrued to the family.

कुछ राजनीतिक वंश:
 The Beazley and Crean families (Australian Labor Party)
 Ziaur Rahman's and Sheikh Mujibur Rahman's families (Bangladesh)
 Aung San Suu Kyi's family (Burma)
 The Nehru-Gandhi family (India)
 The Soekarnos (Indonesia)
 The Kims (North Korea)
 The Bhutto family (Pakistan)
 The Zia family (Pakistan)
 The Macapagal Family (Philippines)
 The Aquino Family(Philippines)
 The Estrada Family (Philippines)
 The Marcos Family (Philippines)
 The Medici family (Republic of Florence)
 Lee Kuan Yew's family (Singapore)
 Solomon Bandaranaike's family (Sri Lanka)
 The Assads (Syria)
 The Churchills/Dukes of Marlborough (UK)
 The (Earl) Russells (UK)
 The Chamberlains (UK)
 The Greys (UK)
 The Pitts (UK)
 The Adamses (United States)
 The Kennedys (United States)
 The Bushes (United States)
 The Long family (United States)
 The Roosevelts (United States)
 The Tafts (United States)
 The Cuomo family (United States)
 The Udalls (United States)

इन्हें भी देखें 
 वंशवाद

सन्दर्भ 

इतिहास
विश्व का इतिहास
इतिहास संबन्धित सूची
कूल एक हिन्दी शब्द है।

उदाहरण

मूल

अन्य अर्थ

संबंधित शब्द

हिंदी में

अन्य भारतीय भाषाओं में निकटतम शब्द 

शब्दार्थ
रचयिता एक हिन्दी शब्द है। रचयिता किसी भी लिखित कार्य जैसे पुस्तक या नाटक का निर्माता या प्रवर्तक होता है, और उसे लेखक भी माना जाता है। अधिक व्यापक रूप से परिभाषित किया गया है, रचयिता या लेखक "वह व्यक्ति है जिसने किसी चीज़ की उत्पत्ति या उसे अस्तित्व दिया है" और जिसकी रचना के लिए ज़िम्मेदारी निर्धारित होती है।

उदाहरण

मूल

अन्य अर्थ

संबंधित शब्द

हिंदी में

अन्य भारतीय भाषाओं में निकटतम शब्द 

शब्दार्थ
रचनाकार का अर्थ है, रचनात्मक कार्य सम्पन्न करने वाला।

उदाहरण 
अशोकजी इस नाटक के रचनाकार हैं।

मूल

अन्य अर्थ

संबंधित शब्द

हिंदी में

अन्य भारतीय भाषाओं में निकटतम शब्द 

शब्दार्थ
रमणीक का अर्थ होता है सुन्दर और मनभावन, मोहक। यह शब्द प्रायः दृश्यों तथा स्थानों के लिये प्रयुक्त होता है।

उदाहरण 
 कन्याकुमारी पर्यटकों के लिये अत्यंत रमणीक स्थान है।

मूल 
रमण, रमना आदि सभी एक ही मूल से बने शब्द हैं।

अन्य अर्थ

संबंधित शब्द 
 रम्य
 सुरम्य
 मनोहर
 मनहर
 सुन्दर
 वादी-ए-रंगीं (उर्दू)

हिंदी में 
 रमण

अन्य भारतीय भाषाओं में निकटतम शब्द 

शब्दार्थ
मुग्ध एक हिन्दी शब्द है।

उदाहरण

मूल

अन्य अर्थ

संबंधित शब्द

हिंदी में

अन्य भारतीय भाषाओं में निकटतम शब्द 

शब्दार्थ
भव्य शानदार को कहते हैं।

उदाहरण 
उसने एक भव्य ईमारत बना डाली।

मूल

अन्य अर्थ

संबंधित शब्द

हिंदी में

अन्य भारतीय भाषाओं में निकटतम शब्द 

शब्दार्थ
अकाल भोजन का एक व्यापक अभाव है जो किसी भी पशुवर्गीय प्रजाति पर लागू हो सकता है। इस घटना के साथ या इसके बाद आम तौर पर क्षेत्रीय कुपोषण, भुखमरी, महामारी और मृत्यु दर में वृद्धि हो जाती है। जब किसी क्षेत्र में लम्बे समय तक (कई महीने या कई वर्ष तक) वर्षा कम होती है या नहीं होती है तो इसे सूखा या अकाल कहा जाता है। सूखे के कारण प्रभावित क्षेत्र की कृषि एवं वहाँ के पर्यावरण पर अत्यन्त प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था डगमगा जाती है। इतिहास में कुछ अकाल बहुत ही कुख्यात रहे हैं जिसमें करोंड़ों लोगों की जाने गयीं हैं।

अकाल राहत के आपातकालीन उपायों में मुख्य रूप से क्षतिपूरक सूक्ष्म पोषक तत्व जैसे कि विटामिन और खनिज पदार्थ देना शामिल है जिन्हें फोर्टीफाइड शैसे पाउडरों के माध्यम से या सीधे तौर पर पूरकों के जरिये दिया जाता है। सहायता समूहों ने दाता देशों से खाद्य पदार्थ खरीदने की बजाय स्थानीय किसानों को भुगतान के लिए नगद राशि देना या भूखों को नगद वाउचर देने पर आधारित अकाल राहत मॉडल का प्रयोग करना शुरू कर दिया है क्योंकि दाता देश स्थानीय खाद्य पदार्थ बाजारों को नुकसान पहुंचाते हैं।

लंबी अवधि के उपायों में शामिल हैं आधुनिक कृषि तकनीकों जैसे कि उर्वरक और सिंचाई में निवेश, जिसने विकसित दुनिया में भुखमरी को काफी हद तक मिटा दिया है। विश्व बैंक की बाध्यताएं किसानों के लिए सरकारी अनुदानों को सीमित करते हैं और उर्वरकों के अधिक से अधिक उपयोग के अनापेक्षित परिणामों: जल आपूर्तियों और आवास पर प्रतिकूल प्रभावों के कारण कुछ पर्यावरण समूहों द्वारा इसका विरोध किया जाता है।

अकाल के कारण 

अकाल की परिभाषाएं तीन अलग-अलग श्रेणियों पर आधारित हैं - खाद्य आपूर्ति के आधार पर, भोजन की खपत के आधार पर और मृत्यु दर के आधार पर. अकाल की कुछ परिभाषाएं हैं:

 ब्लिक्स - खाद्य पदार्थों की व्यापक कमी जिसके कारण क्षेत्रीय मृत्यु दरों में उल्लेखनीय वृद्धि हो जाती है।
 ब्राउन और एखोलम - खाद्य आपूर्ति में अचानक, तीव्रता से होने वाली कमी जिसके परिणाम स्वरूप व्यापक भुखमरी पैदा हो जाती है।
 स्क्रिमशॉ - बड़ी संख्या में लोगों की भोजन की खपत के स्तर में अचानक गिरावट. 
 रैवेलियन - किसी आबादी के कुछ खंडों में भोजन ग्रहण करने पर असामान्य रूप से गंभीर खतरे के साथ असामान्य रूप से उच्च मृत्यु दर.
 क्यूनी - परिस्थितियों का एक ऐसा सेट जो उस समय उत्पन्न होता है जब किसी क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोग पर्याप्त मात्रा में भोजन प्राप्त नहीं कर पाते हैं जिसके परिणाम स्वरूप एक बड़े पैमाने पर तीव्रता से कुपोषण फ़ैल जाता है।

किसी आबादी में खाद्य पदार्थों की कमी या तो भोजन की कमी या फिर भोजन के वितरण में कठिनाइयों के कारण होता है; यह स्थिति प्राकृतिक जलवायु के उतार-चढ़ावों और दमनकारी सरकार या युद्ध से संबंधित चरम राजनीतिक परिस्थितियों के कारण और भी बदतर हो सकती है। आयरलैंड का भीषण अकाल आनुपातिक रूप से सबसे बड़े ऐतिहासिक अकालों में से एक था। इसकी शुरुआत 1845 में आलू की बीमारी की वजह से हुई थी और यह इसलिए भी हुआ क्योंकि खाद्य पदार्थों को आयरलैंड से इंग्लैंड भेजा जा रहा था। केवल अंग्रेज ही उच्च मूल्यों का भुगतान करने में सक्षम थे। हाल ही में इतिहासकारों ने अपने उन आकलनों को संशोधित किया है जिसके अनुसार यह बताया गया था कि अकाल को कम करने में अंग्रेजों द्वारा कितना अधिक नियंत्रण का प्रयास किया जा सकता था, इसमें यह पाया गया कि आम तौर पर जितना समझा जाता था उन्होंने उससे कहीं अधिक मदद करने की कोशिश की थी। अकाल के कारण के लिए 1981 तक परंपरागत व्याख्या खाद्य पदार्थों की उपलब्धता में कमी (एफएडी) की परिकल्पना के रूप में थी। धारणा यह थी कि सभी अकालों की केंद्रीय वजह खाद्य पदार्थों की उपलब्धता में कमी थी। हालांकि एफएडी यह नहीं समझा पाया कि क्यों आबादी का केवल एक ख़ास खंड जैसे कि खेतिहर मजदूर अकाल से प्रभावित थे जबकि अन्य अकाल से अछूते थे। हाल ही के कुछ अकालों के अध्ययन के आधार पर एफएडी की निर्णायक भूमिका पर सवाल उठाया गया है और यह सुझाव दिया गया है कि जल्द से जल्द भुखमरी की स्थिति लाने का कारण बनने वाली प्रणालियों में सिर्फ खाद्य पदार्थों की उपलब्धता में कमी के अलावा भी कई अन्य कारक शामिल हैं। इस दृष्टिकोण के अनुसार, अकाल अधिकारों का एक परिणाम है, इस प्रस्तावित सिद्धांत को "आदान-प्रदान के अधिकारों की विफलता" या एफईई कहा जाता है। किसी व्यक्ति के पास विभिन्न प्रकार की वस्तुएं हो सकती हैं जिनकी अदला-बदली एक बाजार व्यवस्था में उसकी जरूरत की अन्य चीजों के बदलें में की जा सकती है। आदान-प्रदान व्यापार या उत्पादन या दोनों के संयोजन के माध्यम से किया जा सकता है। इन अधिकारों को व्यापार-आधारित या उत्पादन-आधारित अधिकार कहा जाता है। इस प्रस्तावित दृष्टिकोण के अनुसार अकाल की स्थिति व्यक्ति द्वारा अपने अधिकारों के आदान-प्रदान की क्षमता ख़त्म हो जाने के कारण आती है। एफईई के कारण होने वाले अकालों का एक उदाहरण किसी खेतिहर मजदूर द्वारा अपने प्रमुख अधिकारों का आदान-प्रदान करने की अक्षमता है, जैसे कि चावल का मजदूर जब उसके रोजगार की स्थिति डावांडोल या पूरी तरह से समाप्त हो जाती है।

कुछ तत्त्व एक विशेष क्षेत्र को अकाल के लिए अत्यधिक संवेदनशील बना देते हैं। इनमें शामिल हैं:

 गरीबी
 अनुपयुक्त भौतिक अवसंरचना
 अनुपयुक्त सामाजिक ढांचा
 एक दमनकारी राजनीतिक व्यवस्था
 एक कमजोर या पहले से तैयार नहीं रहने वाली सरकार

कुछ मामलों में, जैसे कि चीन में ग्रेट लीप फॉरवार्ड (जिसने पूर्ण संख्याओं में सबसे बड़ा अकाल पैदा किया था), 1990 के दशक के मध्य में उत्तर कोरिया में या सन 2000 की शुरुआत में जिम्बाब्वे में, अकाल की स्थिति सरकारी नीतियों के एक अनपेक्षित परिणाम के रूप में उत्पन्न हो सकती है। मलावी ने विश्व बैंक की बाध्यताओं के खिलाफ किसानों को अनुदान देकर अपने अकाल का खात्मा किया। इथियोपिया में 1973 के वोल्लो अकाल के दौरान खाद्य पदार्थों को वोल्लो से बाहर राजधानी शहर अदीस अबाबा में भेजा जाता था जहां इनके लिए कहीं अधिक कीमतें मिल सकती थीं। 1970 के दशक के उत्तरार्द्ध और 1980 के दशक की शुरुआत में इथियोपिया और सूडान की तानाशाहियों के निवासियों को भारी अकाल का सामना करना पड़ा, लेकिन जिम्बाब्वे और बोत्सवाना के लोकतंत्रों में राष्ट्रीय खाद्य उत्पादन में गंभीर कमी के बावजूद भी उन्होंने अपना बचाव किया। सोमालिया में अकाल एक विफल प्रशासन की वजह से आया।

कई अकाल बड़ी आबादी वाले देशों की तुलना में, जिनकी आबादी क्षेत्रीय वहन क्षमता से अधिक हो जाती है, खाद्य उत्पादन में असंतुलन के कारण पैदा होते हैं। ऐतिहासिक रूप से अकाल की स्थिति कृषि संबंधी समस्याओं जैसे कि सूखा, फसल की विफलता या महामारी की वजह से आयी है। मौसम के बदलते मिजाज, संकट, युद्ध और महामारी जनित बीमारियों जैसे कि काली मौत से निबटने में मध्य युगीन सरकारों की अप्रभावशीलता मध्य युगों के दौरान यूरोप में सैकड़ों अकालों को जन्म देने में सहायक सिद्ध हुई जिनमें ब्रिटेन में 95 और फ्रांस में 75 अकाल शामिल हैं। फ्रांस में सौ सालों के युद्ध, फसल की विफलताओं और महामारियों ने इसकी आबादी दो-तिहाई तक कम कर दी थी।

फसल कटाई की विफलता या परिस्थितियों में बदलाव जैसे कि सूखा एक ऐसी स्थिति पैदा कर सकता है जिसके द्वारा एक बड़ी संख्या में लोग निरंतर वहां रह सखते हैं जहां जमीन की वहन क्षमता में मूलतः अस्थायी रूप से कमी आ गयी है। अकाल को अक्सर निर्वाह के लायक कृषि के साथ जोड़ा जाता है। एक आर्थिक रूप से मजबूत क्षेत्र में कृषि का कुल अभाव अकाल का कारण नहीं बनता है; एरिज़ोना और अन्य समृद्ध क्षेत्र अपने खाद्य पदार्थ के बहुत अधिक हिस्से का आयात करते हैं, क्योंकि इस तरह के क्षेत्र व्यापार के लिए पर्याप्त आर्थिक सामग्रियों का उत्पादन करते हैं।

अकाल की स्थिति ज्वालामुखीय घटना के कारण भी उत्पन्न हुई है। 1885 में इंडोनेशिया में माउंट तंबोरा ज्वालामुखी में विस्फोट के कारण दुनिया भर में फसल नष्ट हो गए थे और अकाल की स्थितियां पैदा हो गयी थीं जिसके कारण 19वीं सदी का भीषण अकाल पड़ा था। वैज्ञानिक समुदाय की मौजूदा सर्वसम्मति यह है कि ऊपरी वायुमंडल में निकलने वाले एयरोसोल और धूलकण सूर्य की ऊर्जा को जमीन तक पहुंचने से रोककर तापमान को ठंडा कर देते हैं। यही प्रणाली सैद्धांतिक रूप से अत्यंत विशाल उल्का-पिंडों के कारण बड़े पैमाने पर विलुप्तियों की हद तक पड़ने वाले प्रभावों पर लागू होती है।

भविष्य में अकाल के खतरे 
गार्जियन की रिपोर्ट है कि 2007 में दुनिया की लगभग 40% कृषि योग्य भूमि का स्तर गंभीर रूप से गिर गया है। यूएनयू के घाना-स्थित इंस्टिट्यूट फॉर नेचुरल रिसोर्सेस इन अफ्रीका के अनुसार, अगर अफ्रीका में मिट्टी के स्तर में गिरावट के मौजूदा रुझान जारी रहे तो यह महाद्वीप 2025 तक अपनी आबादी के सिर्फ 25% हिस्से को भोजन प्रदान करने में सक्षम होगा।  2007 के उत्तरार्द्ध तक जैव ईंधन में इस्तेमाल के लिए होने वाली खेती में वृद्धि के साथ-साथ दुनिया में तेल की कीमतों के तकरीबन 100 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच जाने के कारण मुर्गियों और डेयरी के गायों तथा अन्य पशुओं को खिलाने वाले खाद्यान्नों की कीमतें काफी बढ़ गयी थीं, इसी वजह से गेहूं (58% अधिक), सोयाबीन (32% अधिक) और मक्के (11% अधिक) की कीमतों में वर्ष भर में काफी बढ़त देखी गयी। सन 2007 में दुनिया भर के कई देशों में खाद्य दंगे होते देखे गए। स्टेम रस्ट की एक महामारी जो गेहूं के लिए विनाशकारी होती है और Ug99 प्रजाति के कारण पैदा होती है, 2007 में यह संपूर्ण अफ्रीका और एशिया में फ़ैल गयी थी।

20वीं सदी की शुरुआत में आंशिक रूप से अकाल से निपटने के क्रम में खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने के लिए नाइट्रोजन उर्वरकों, नए कीटनाशकों, रेगिस्तानी कृषि और अन्य कृषि प्रौद्योगिकियों का इस्तेमाल होना शुरु हो गया था। 1950 और 1984 के बीच जब हरित क्रांति ने कृषि को प्रभावित किया, विश्व खाद्यान्न उत्पादन में 250% की वृद्धि हुई। इस बढ़त का ज्यादातर हिस्सा गैर-टिकाऊ है। इन कृषि प्रौद्योगिकियों ने फसल की पैदावार को अस्थायी रूप से बढ़ा दिया था, लेकिन कम से कम 1995 तक इस बात के संकेत मिल गए थे कि ये कृषि योग्य भूमि की कमी का कारण बन सकते थे (जैसे कि कीटनाशकों की दृढ़ता जो मिट्टी का संदूषण बढ़ाती है और खेती के लिए उपलब्ध क्षेत्र को कम कर देती है). विकसित देशों ने अकाल की समस्या वाले विकासशील देशों के साथ इन प्रौद्योगिकियों की साझेदारी की है, लेकिन अपेक्षाकृत कम विकसित देशों में इन प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देने के लिए नैतिक सीमाएं मौजूद हैं। इसके लिए अक्सर अकार्बनिक उर्वरकों और स्थिरता की कमी वाले कीटनाशकों के एक संयोजन को जिम्मेदार ठहराया जाता है।

कॉर्नेल विश्वविद्यालय में पारिस्थितिकी और कृषि के प्रोफ़ेसर, डेविड पिमेंटेल और नेशनल रिसर्च इंस्टिट्यूट ऑन फ़ूड एंड न्यूट्रीशन (आईएनआरएएन) में वरिष्ठ शोधकर्ता, मारियो गियामपिएत्रो अपने अध्ययन फ़ूड, लैंड, पॉपुलेशन एंड द यूएस इकोनोमी में एक चिरस्थायी अर्थव्यवस्था के लिए अमेरिका की अधिकतम जनसंख्या 200 मिलियन पर रखते हैं। अध्ययन कहता है कि एक चिरस्थायी अर्थव्यवस्था को प्राप्त करने और आपदा से बचने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका को अपनी आबादी कम से कम एक-तिहाई कम करनी होगी और दुनिया की आबादी को दो-तिहाई तक कम करना होगा।  इस अध्ययन के लेखकों का मानना ​​है कि उल्लिखित कृषि संकट केवल 2020 के बाद हमें प्रभावित करना शुरू कर देगा और 2050 तक यह संकटपूर्ण नहीं होगा। आगामी वैश्विक तेल उत्पादन के चोटी पर पहुंचने (और इसके बाद उत्पादन में गिरावट) के साथ-साथ उत्तर अमेरिकी प्राकृतिक गैस उत्पादन के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचने से इस कृषि संकट को अपेक्षा से कहीं अधिक जल्दी ला देने की संभावना काफी बढ़ जाएगी.

भूविज्ञानी डेल एलन फीफर का दावा है कि आने वाले दशकों में खाद्य पदार्थों की कीमतों में किसी राहत के बिना उत्तरोत्तर वृद्धि और वैश्विक स्तर पर ऐसी भारी भुखमरी देखी जा सकती है जिसका अनुभव पहले कभी नहीं किया गया है। पानी की कमी की समस्या जो अनेक छोटे देशों में खाद्यान्नों के भारी आयात को पहले से बढ़ावा दे रही है, यह जल्दी ही बड़े देशों जैसे कि चीन या भारत में भी यही स्थिति ला सकती है। शक्तिशाली डीजल और बिजली के पम्पों के व्यापक अति-उपयोग के कारण अनेक देशों (उत्तरी चीन, अमेरिका और भारत सहित) में जल स्तर घटता जा रहा है। पाकिस्तान, ईरान और मेक्सिको अन्य प्रभावित देशों में शामिल हैं। यह अंततः पानी की कमी और अनाज फसल में कटौती करने का कारण बनेगा. यहाँ तक कि अपने जलवाही स्तरों की अत्यधिक पम्पिंग के साथ चीन ने एक अनाज घाटा विकसित किया है जो अनाज की कीमतों पर दबाव बढाने में योगदान करता है। इस सदी के मध्य तक दुनिया भर में पैदा होने वाले तीन बिलियन लोगों में से अधिकांश के ऐसे देशों में जन्म लेने की संभावना है जो पहले से ही पानी की कमी का सामना कर रही है।

चीन और भारत के बाद पानी की भारी कमी से जूझते दूसरी श्रेणी के अपेक्षाकृत छोटे देशों में शामिल हैं -- अल्जीरिया, मिस्र, इरान, मेक्सिको और पकिस्तान. इनमे से चार देश अपने लिए अनाज के एक बड़े हिस्से का आयात पहले से ही किया करते हैं। सिर्फ पाकिस्तान आंशिक रूप से आत्मनिर्भर बना हुआ है। लेकिन हर साल 4 मिलियन की बढ़ती आबादी के कारण इसे भी जल्द ही अनाज के लिए विश्व बाज़ार का रुख करना पड़ेगा. संयुक्त राष्ट्र की जलवायु रिपोर्ट के अनुसार हिमालय के हिमनद जो एशिया की सबसे बड़ी नदियों - गंगा, सिंधु, ब्रह्मपुत्र, यांग्जे, मेकांग, सलवीन और येलो के लिए शुष्क-मौसम के प्रमुख जल स्रोत हैं, ये तापमान में वृद्धि और मानवीय मांग बढ़ने के कारण 2035 तक गायब हो सकते हैं। बाद में यह पता चला कि संयुक्त राष्ट्र संघ की जलवायु रिपोर्ट में इस्तेमाल किये गये स्रोत में दरअसल 2035 नहीं बल्कि 2350 कहा गया है। हिमालयी नदियों के जलनिकास मार्ग के आसपास की भूमि में लगभग 2.4 बिलियन लोग रहते हैं। भारत, चीन, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और म्यांमार को आने वाले दशकों में गंभीर सूखे के बाद बाढ़ का सामना करना पड़ सकता है। सिर्फ भारत में ही गंगा नदी 500 मिलियन से अधिक लोगों को पेयजल और खेती के लिए पानी उपलब्ध कराती है।

अकाल के लक्षण 
अकाल उप-सहाराई अफ्रीकी देशों को सबसे अधिक बुरी तरह से प्रभावित करता है लेकिन खाद्य संसाधनों की अत्यधिक खपत, भूजल की अत्यधिक निकासी, युद्ध, आंतरिक संघर्ष और आर्थिक विफलता के साथ अकाल दुनिया भर के लिए एक समस्या बनी हुई है जिसका सामना सैकड़ों लाख लोगों को करना पड़ता है। इस तरह के अकाल बड़े पैमाने पर कुपोषण और दरिद्रता का कारण बनते हैं; 1980 के दशक में इथियोपिया के अकाल में मरने वालों की संख्या अत्यधिक थी, हालांकि 20वीं सदी के एशियाई अकालों में भी व्यापक स्तर पर लोगों की मौतें हुई थीं। आधुनिक अफ्रीकी अकालों की पहचान व्यापक स्तर के अभाव और कुपोषण के साथ विशेष कर छोटे बच्चों की मृत्यु दर में वृद्धि से होती है।

प्रतिरक्षण सहित राहत की प्रौद्योगिकियों ने जन स्वास्थ्य अवसंरचना, सामान्य खाद्य राशन और कमजोर बच्चों के लिए पूरक भोजन की व्यवस्था में सुधार किया है, इससे अकालों के मृत्यु दर संबंधी प्रभावों में अस्थायी रूप से कमी आयी है, जबकि उनके आर्थिक परिणामों को अपरिवर्तित छोड़ दिया गया है और खाद्य उत्पादन क्षमता के सापेक्ष एक क्षेत्रीय जनसंख्या के एक बहुत बड़े अंतर्निहित मुद्दे को हल नहीं किया गया है। मानवीय संकट भी नरसंहार अभियानों, गृह युद्धों, शरणार्थियों के प्रवाह और चरम हिंसा तथा साम्राज्य के पतन के प्रकरणों से उत्पन्न होते हैं जिससे प्रभावित आबादी के बीच अकाल की स्थिति पैदा हो जाती है।

भुखमरी और अकाल का खात्मा करने के लिए दुनिया के नेताओं द्वारा बार-बार दोहराए गए कथित इरादों के बावजूद अकाल अफ्रीका और एशिया के ज्यादातर भागों में एक चिरकालिक खतरा बना हुआ है। जुलाई 2005 में फैमिन अर्ली वार्निंग सिस्टम्स नेटवर्क ने नाइजीरिया के साथ-साथ चाड, इथियोपिया, दक्षिण सूडान, सोमालिया और जिम्बाब्वे को आपात स्थिति का लेबल दिया था। जनवरी 2006 में संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन ने चेतावनी दी कि गंभीर सूखे और सैन्य संघर्ष के संयुक्त प्रभाव के कारण सोमालिया, केन्या, जिबूती और इथियोपिया में 11 मिलियन लोग भुखमरी के कगार पर थे।  2006 में अफ्रीका में सबसे गंभीर मानवीय संकट सूडान के दारफुर क्षेत्र में था।

कुछ लोगों का मानना था कि हरित क्रांति 1970 और 1980 के दशक में अकाल का एक उपयुक्त जवाब था। हरित क्रांति की शुरुआत 20वीं सदी में अधिक-उपज वाले फसलों के संकर किस्मों के साथ हुई थी। 1950 और 1984 के बीच जब हरित क्रांति ने दुनिया भर में कृषि का नक्शा बदल दिया, विश्व अनाज उत्पादन में 250% की वृद्धि हुई।  कुछ लोग इस प्रक्रिया की आलोचना करते हुए कहते हैं कि इन नए उच्च-उपज वाले फसलों के लिए अधिक रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों की आवश्यकता होती है जो वातावरण को नुकसान पहुंचा सकते हैं। हालांकि अकाल से पीड़ित विकासशील देशों के लिए यह एक विकल्प था। ये अधिक-उपज वाले फसल तकनीकी रूप से अधिक लोगों को भोजन प्रदान करना संभव बनाते हैं। हालांकि इस बात के संकेत मिले हैं कि व्यापक स्तर की कृषि के साथ जुड़ी कुछ विशेष नीतिओं जैसे कि भूजल के अत्यधिक दोहन और कीटनाशकों तथा अन्य कृषि रसायनों के अत्यधिक प्रयोग के कारण दुनिया के कई क्षेत्रों में क्षेत्रीय खाद्य उत्पादन चोटी पर पहुंच गया है।

फ्रांसिस मूर लैपे जो बाद में इंस्टिट्यूट फॉर फ़ूड एंड डेवलपमेंट पॉलिसी (फ़ूड फर्स्ट) के सह-संस्थापक बने, उन्होंने डाइट फॉर ए स्मॉल प्लानेट (1971) में यह तर्क दिया कि शाकाहारी आहार मांसाहारी आहारों की तुलना में उन्हीं संसाधनों के साथ एक बड़ी आबादी के लिए भोजन प्रदान कर सकते हैं।

ध्यान देने योग्य बात है कि आधुनिक अकालों की स्थिति को कभी-कभी गुमराह आर्थिक नीतियों, कुछ ख़ास आबादी को निर्धन बनाए या हाशिये में रखने के लिए बनाए गए राजनीतिक डिजाइन या युद्ध के कृत्यों द्वारा बिगाड़ दिया जाता है, राजनीतिक अर्थशास्त्रियों ने उन राजनीतिक परिस्थितियों की जांच की है जिसके तहत अकाल को रोका जा सकता है। अमर्त्य सेन  कहते हैं कि भारत में मौजूद उदारवादी संस्थाओं के साथ-साथ प्रतिस्पर्धी चुनाव और एक मुक्त प्रेस ने आजादी के बाद से देश में अकाल को रोकने में एक प्रमुख भूमिका निभाई है। एलेक्स डी वाल ने शासकों और जनता के बीच "राजनीतिक अनुबंध" पर ध्यान केंद्रित करने के लिए यह सिद्धांत विकसित किया है जो अकाल को रोकना सुनिश्चित करता है, जिसमें यह उल्लेख किया गया है कि अफ्रीका में ऐसे राजनीतिक अनुबंधों की दुर्लभता और यह खतरा कि अंतरराष्ट्रीय राहत एजेंसियां राष्ट्रीय सरकारों से अकालों के लिए जवाबदेही की स्थिति को हटाकर उन अनुबंधों को कमजोर कर देंगी।

अकाल के प्रभाव 
अकाल के जनसांख्यिकीय प्रभाव तीक्ष्ण होते हैं। मृत्यु दर बच्चों और बुजुर्गों के बीच केंद्रित रहती है। एक सुसंगत जनसांख्यिकीय तथ्य यह है कि दर्ज किये गए सभी अकालों में पुरुष मृत्यु दर महिला से अधिक होती है, यहाँ तक कि उन आबादियों में भी (जैसे कि उत्तरी भारत और पाकिस्तान) जहां पुरुष को सामान्य रूप से लंबी उम्र का लाभ मिलता है। इसके कारणों में कुपोषण के दबाव में अधिक से अधिक महिला लचीलापन और संभवतः महिलाओं के शरीर में वसा की स्वाभाविक रूप से उच्च प्रतिशत को शामिल किया जा सकता है। अकाल के साथ-साथ प्रजनन क्षमता भी कम हो जाती है। इसलिए अकाल किसी आबादी के प्रजनन के कोर - वयस्क महिलाओं - को आबादी की अन्य श्रेणियों की तुलना में कम प्रभावित करते हैं और अकाल के बाद की अवधियों की पहचान अक्सर बढ़ी हुई जन्म दर के साथ "पूर्वस्थिति" में आने के रूप में होती है। इसके बावजूद कि थॉमस माल्थस के सिद्धांत यह भविष्यवाणी करते हैं कि अकाल उपलब्ध खाद्य संसाधनों के अनुरूप आबादी के आकार को कम कर देते हैं, वास्तव में यहाँ तक कि सबसे गंभीर अकालों ने भी कुछ सालों से अधिक के लिए आबादी के विकास को शायद ही कभी कमजोर किया है। 1958-61 में चीन में, 1943 में बंगाल में और 1983-1985 में इथियोपिया में मृत्यु दर को एक बढ़ती हुई आबादी द्वारा सिर्फ कुछ ही वर्षों में पूर्वस्थिति में ला दिया था। अधिक से अधिक लंबी-अवधि का जनसांख्यिकीय प्रभाव है उत्प्रवास: 1840 के दशक के अकाल के बाद मुख्य रूप से आयरलैंड की आबादी उत्प्रवास की लहर के कारण काफी कम हो गयी थी।

खाद्य असुरक्षा के स्तर 
आधुनिक समय में स्थानीय और राजनीतिक सरकार तथा गैर-सरकारी संगठन जो अकाल राहत प्रदान करते हैं उनके पास सीमित संसाधन मौजूद होते हैं जिनके जरिये उन्हें एक साथ उत्पन्न होने वाली खाद्य असुरक्षा की विभिन्न स्थितियों से निबटना पड़ता है। इस प्रकार खाद्य राहत सामग्री के सबसे प्रभावशाली ढंग से आवंटन के क्रम में खाद्य सुरक्षा के वर्गीकरण को श्रेणीबद्ध करने के विभिन्न विधियों का इस्तेमाल किया जाता है। इनमें से एक सबसे प्रारंभिक विधि 1880 के दशक में अंग्रेजों द्वारा तैयार की गयी भारतीय अकाल संहिता है। संहिताओं में खाद्य असुरक्षा के तीन चरणों को सूचीबद्ध किया गया था: लगभग-तंगी, अभाव और अकाल, इसके अलावा ये बाद में अकाल की चेतावनी या मापन प्रणालियों के निर्माण में अत्यंत प्रभावशाली रहे थे। उत्तरी केन्या में तुर्काना लोगों के आवासीय क्षेत्रों की निगरानी के लिए विकसित पूर्व चेतावनी प्रणाली में भी तीन स्तर हैं, लेकिन प्रत्येक चरण का संबंध संकट को कम करने और इसे कमजोर करने की एक पूर्व-निर्धारित प्रतिक्रिया से जुड़ा हुआ है।

1980 और 1990 के दशक में दुनिया भर में अकाल राहत संगठनों के अनुभव के परिणाम स्वरूप कम से कम दो प्रमुख गतिविधियां सामने आयीं: "आजीविका का दृष्टिकोण" और किसी संकट की गंभीरता के निर्धारण के लिए पोषण संकेतकों का अधिक से अधिक इस्तेमाल. खाद्य सामग्री की तनावपूर्ण स्थितियों में व्यक्तियों और समूहों द्वारा खपत की पूर्ति सीमित कर इसका सामना करने का प्रयास किया जाएगा जो कृषि योग्य भूमि के भूखंडों को बेचने जैसे निराशाजनक उपायों को आजमाने से पहले पूरक आय आदि के वैकल्पिक माध्यम हो सकते हैं। जब स्वयं-सहायता के सभी माध्यमों का उपयोग कर लिया जाता है, तब प्रभावित आबादी भोजन की खोज में पलायन करने लगती है या पूर्ण रूप से व्यापक भुखमरी का शिकार बन जाती है। इस प्रकार अकाल को आंशिक रूप से एक सामाजिक घटना के रूप में देखा जा सकता है जिसमें बाजार, खाद्य सामग्रियों की कीमतें और सामाजिक सहायता संरचनाएं शामिल होती हैं। एक दूसरा तैयार किया गया सबक था अकाल की गंभीरता का एक मात्रात्मक मापन प्रदान करने के लिए विशेष रूप से बच्चों में तीव्र पोषण आकलनों का अधिक से अधिक उपयोग.

2004 के बाद से अकाल राहत में संलग्न कई सबसे महत्वपूर्ण संगठन जैसे कि विश्व खाद्य कार्यक्रम और अंतरराष्ट्रीय विकास की अमेरिकी एजेंसी ने तीव्रता और परिमाण को मापने के लिए एक पंच-स्तरीय पैमाने को अपनाया है। तीव्रता का पैमाना किसी भी परिस्थिति को खाद्य सुरक्षित, खाद्य असुरक्षित, खाद्य संकट, अकाल, गंभीर अकाल और चरम अकाल के रूप में वर्गीकृत करने के लिए आजीविका के उपायों और मृत्यु दर तथा बाल कुपोषण की माप दोनों का इस्तेमाल करता है। मौतों की संख्या परिमाण के नाम का निर्धारण करती है जिसमें 1000 से कम हताहतों की संख्या एक "मामूली अकाल" को परिभाषित करती है और एक "भयावह अकाल" का नतीजा 1,000,000 से अधिक लोगों की मौतों के रूप में सामने आता है।

अकाल की कार्यवाही

अकाल निवारण 
पश्चिम में पायी जाने वाली आधुनिक कृषि प्रौद्योगिकियों जैसे कि नाइट्रोजन उर्वरकों और कीटनाशकों को एशिया में लाने के प्रयासों को हरित क्रांति कहा गया जिसके परिणाम स्वरूप कुपोषण में उसी तरह की कमी आयी जैसा कि पहले पश्चिमी देशों में देखा गया था। यह मौजूदा बुनियादी ढांचे और संस्थाओं की वजह से संभव हुआ था जिनकी आपूर्ति अफ्रीका में काफी कम है जैसे कि सड़कों या सार्वजनिक बीज कंपनियों की एक प्रणाली जो बीजों को उपलब्ध कराती है। खाद्य असुरक्षा वाले क्षेत्रों में मुफ्त या अनुदानिक उर्वरकों तथा बीजों को उपलब्ध कराने जैसे उपायों के जरिये किसानों की सहायता करने से फसल कटाई में वृद्धि होती है और खाद्य पदार्थों की कीमतें कम होती हैं।

विश्व बैंक और कुछ धनी देश उन देशों पर दबाव डालते हैं जो निजीकरण के नाम पर रियायती कृषि सामग्रियों जैसे कि उर्वरक में कटौती करने या इसे ख़त्म करने के क्रम में सहायता प्राप्त करने के लिए उन पर निर्भर करते हैं, इसके बावजूद कि संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप ने अपने स्वयं के किसानों को व्यापक रूप से रियायत दी है। अगर ज्यादातर नहीं तो कई किसान इतने गरीब होते हैं कि वे बाजार के मूल्यों पर उर्वरकों को खरीदने की स्थिति में नहीं होते हैं। उदाहरण के लिए, मलावी के मामले में इसकी 13 मिलियन आबादी में से लगभग पांच मिलियन लोगों को निरंतर आपातकालीन खाद्य सहायता की जरूरत पड़ती है। हालांकि सरकार द्वारा अपनी नीति को बदलने और उर्वरक तथा बीज के लिए रियायतें देने के बाद किसानों ने 2006 और 2007 में रिकॉर्ड-तोड़ मक्के की फसल का उत्पादन किया जिससे उत्पादन 2005 में 1.2 मिलियन की तुलना में बढ़कर 2007 में 3.4 मिलियन हो गया।  इससे खाद्य सामग्री की कीमतें कम हो गयीं और कृषि श्रमिकों का पारिश्रमिक बढ़ गया।  मलावी खाद्य पदार्थों का एक प्रमुख निर्यातक बन गया जो दक्षिणी अफ्रीका के किसी भी अन्य देश की तुलना में विश्व खाद्य कार्यक्रम और संयुक्त राष्ट्र को सर्वाधिक मक्के की बिक्री करने लगा।  किसानों की मदद के प्रस्तावकों में अर्थशास्त्री जेफ्री सैक्स भी शामिल हैं जिन्होंने इस विचार का समर्थन किया है कि धनी राष्ट्रों को अफ्रीका के किसानों के लिए खाद और बीजों पर निवेश करना चाहिए।

अकाल राहत 
सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी की व्यवस्था सुदृढ़ खाद्य पदार्थों के माध्यम से की जा सकती है। सुदृढ़ खाद्य पदार्थों जैसे कि मूंगफली मक्खन के पाउच (प्लम्पी 'नट को देखें) और स्पाइरूलीना ने मानवीय आपातकाल की स्थितियों में आपातकालीन भोजन की व्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया है क्योंकि इन्हें पैकेटों से सीधे खाया जा सकता है, इनके लिए पैकेट प्रशीतन या दुर्लभ स्वच्छ पानी के साथ सम्मिश्रण की आवश्यकता नहीं होती है, इन्हें वर्षों तक भंडारित किया जा सकता है और सबसे महत्वपूर्ण यह है कि इन्हें अत्यंत गंभीर रूप से बीमार बच्चों को भी दिया जा सकता है। संयुक्त राष्ट्र के 1974 के विश्व खाद्य सम्मेलन में स्पाइरूलीना को 'भविष्य के लिए सबसे अच्छा भोजन' घोषित किया गया था और इसकी प्रत्येक 24 घंटे में तैयार होने वाली फसल इसे कुपोषण को मिटाने के लिए एक शक्तिशाली साधन बनाती है। इसके अलावा बच्चों में दस्त के इलाज के लिए पूरक चीजों जैसे कि विटामिन ए के कैप्सूल या जिंक की गोलियों का इस्तेमाल किया जाता है।

सहायता समूहों के बीच एक बढ़ती समझ यह है कि भूखों को सहायता प्रदान करने के लिए खाद्य सामग्री की बजाय नगदी या नगदी वाउचर देना एक किफायती, तेज और अधिक प्रभावी तरीका है, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहां खाद्य सामग्री उपलब्ध होती है लेकिन इसे खरीद पाना संभव नहीं होता है। 'संयुक्त राष्ट्र का विश्व खाद्य कार्यक्रम जो खाद्य सामग्री का सबसे बड़ा गैर-सरकारी वितरक है, इसने घोषणा की थी कि यह कुछ क्षेत्रों में खाद्य सामग्री की बजाय नगदी और वाउचरों का वितरण करना शुरू करेगा जिसे डब्ल्यूएफपी के कार्यकारी निदेशक जोसेट शीरन ने खाद्य सहायता के क्षेत्र में एक "क्रांति" बताया।  सहायता एजेंसी कन्सर्न वर्ल्डवाइड एक मोबाइल फोन ऑपरेटर, सफारीकॉम के माध्यम से एक विधि का प्रायोगिक अध्ययन कर रही है, सफारीकॉम एक धनराशि हस्तांतरण कार्यक्रम का संचालन करती है जिसके जरिये देश के एक भाग से दूसरे भाग तक नगदी भेजने की सुविधा प्रदान की जाती है।

हालांकि एक सूखे की स्थिति में काफी दूर रहने वाले और बाजारों तक सीमित पहुंच रखने वाले लोगों के लिए खाद्य सामग्री प्रदान करना सहायता पहुंचाने का एक सबसे उपयुक्त तरीका हो सकता है। फ्रेड क्यूनी ने कहा था कि किसी राहत ऑपरेशन की शुरुआत में जिंदगियां बचाने के मौके उस स्थिति में काफी कम हो जाते हैं जब खाद्य सामग्री का आयात किया जाता है। जब तक यह देश में आता है और लोगों तक पहुंचता है, कई लोग मौत के शिकार हो चुके होते हैं।" अमेरिकी कानून जिसके लिए आवश्यकता यह है कि खाद्य सामग्री भूखों के रहने के स्थान की बजाय अपने देश से खरीदी जाए, यह अप्रभावशाली है क्योंकि जो राशि खर्च की जाती है उसका लगभग आधा हिस्सा परिवहन में चला जाता है। फ्रेड क्यूनी ने आगे ध्यान दिलाया कि "हाल के प्रत्येक अकाल के अध्ययन से पता चला है कि खाद्य सामग्री देश में ही उपलब्ध थी - हालांकि यह हमेशा खाद्य सामग्री की कमी वाले निकटवर्ती क्षेत्र में नहीं होता है" और "इसके बावजूद कि स्थानीय मानकों के अनुसार कीमतें इतनी अधिक होती हैं कि गरीब लोग इसे खरीद नहीं सकते, आम तौर पर किसी दाता के लिए संचित खाद्य सामग्री को विदेश से आयात करने की बजाय बढ़ी हुई दरों में खरीदना कहीं अधिक किफायती होगा."

इथियोपिया एक ऐसे कार्यक्रम को बढ़ावा दे रहा है जो अब खाद्य संकट का सामना करने के लिए विश्व बैंक के निर्धारित नुस्खे का एक हिस्सा बन गया है और सहायता संगठनों द्वारा इसे भूखे राष्ट्रों की सबसे अच्छी तरह से सहायता करने के एक मॉडल के रूप में देखा जाने लगा था। देश के मुख्य खाद्य सहायता कार्यक्रम, प्रोडक्टिव सेफ्टी नेट प्रोग्राम के माध्यम से इथियोपिया उन ग्रामीण निवासियों को भोजन या नगदी के लिए काम करने का एक मौक़ा प्रदान करता है जो लंबे समय से भोजन की कमी की समस्या से जूझ रहे हैं। विदेशी सहायता संगठन जैसे कि वर्ल्ड फ़ूड प्रोग्राम उस समय खाद्य पदार्थों की कमी वाले क्षेत्रों में वितरण के लिए आवश्यकता से अधिक खाद्यान्न वाले क्षेत्रों से स्थानीय रूप से खाद्य पदार्थ खरीदने में सक्षम थे।

ऐतिहासिक अकाल, क्षेत्र के अनुसार 
20वीं सदी के दौरान एक अनुमान के मुताबित 70 मिलियन लोग दुनिया भर में अकाल की वजह से मारे गए थे जिनमें से अनुमान के मुताबिक़ 30 मिलियन लोगों की मौत चीन में 1958-61 के अकाल के दौरान हो गई थी। सदी के अन्य सबसे उल्लेखनीय अकालों में बंगाल में 1942-1945 की आपदा, 1928 और 1942 में चीन के अकाल, सोवियत संघ में अकालों की एक श्रृंखला के साथ-साथ 1932-1933 का सोवियत का अकाल, 1932-33 में यूएसएसआर पर लगाया गया स्टालिन का अकाल शामिल है। 20वीं सदी के उत्तरार्द्ध में हुए कुछ भीषण अकाल थे: 1960 के दशक में बाइफ्रान का अकाल, 1970 के दशक में कंबोडिया का अकाल, इथियोपिया का 1984-85 का अकाल और उत्तर कोरिया का 1990 के दशक का अकाल.

अफ्रीका में अकाल 

22वीं सदी ई.पू. के मध्य में एक अचानक और अल्पकालिक जलवायु परिवर्तन हुआ जो कम वर्षा का कारण बना जिसके परिणाम स्वरूप ऊपरी मिस्र में कई दशकों तक सूखा पड़ा रहा। माना जाता है कि परिणामी अकाल और नागरिक संघर्ष पुराने साम्राज्यों के पतन का एक प्रमुख कारण रहा है। फर्स्ट इंटरमीडिएट पीरियड का एक विवरण कहता है, "संपूर्ण ऊपरी मिस्र में भूख की वजह से मौतें हो रही थीं और लोग अपने बच्चों को खा रहे थे।" 1680 के दशक में अकाल का विस्तार संपूर्ण सहेल में हो गया था और 1738 में टिम्बकटू की आधी आबादी अकाल मृत्यु का शिकार हो गई थी। मिस्र को 1687 और 1731 के बीच छः अकालों का सामना करना करना पड़ा था। वह अकाल जिसने 1784 में मिस्र को विपदा में डाला उसमें इसकी लगभग छठे हिस्से की आबादी को अपनी जान गंवानी पड़ी. 18वीं सदी के अंत में और इससे भी अधिक उन्नीसवीं की शुरुआत में मग़रेब को प्लेग और अकाल के संयुक्त रूप से घातक खतरे का सामना करना पड़ा. त्रिपोली और ट्यूनिस ने क्रमशः 1784 और 1785 में अकाल का सामना किया।

जॉन इलिफे के अनुसार, "16वीं सदी के अंगोला के पुर्तगाली अभिलेख दर्शाते हैं कि एक औसतन हर सत्तर साल के बाद एक भीषण अकाल पड़ा है; जिसके साथ-साथ महामारी के रोग की वजह से इसकी एक तिहाई या आधी आबादी काल के गाल में समा गयी होगी जिससे एक पीढ़ी का जनसांख्यिकीय विकास नष्ट हो गया और उपनिवेशवादियों को वापस नदी घाटियों की और रुख करने के लिए मजबूर होना पड़ा."

अफ्रीकी अकाल के इतिहासकारों ने इथियोपिया में बार-बार हुए अकाल को प्रलेखित किया है। संभवतः सबसे बुरी स्थितियां 1888 और उसके बाद के वर्षों में उत्पन्न हुई थीं क्योंकि इरिट्रिया में संक्रमित पशुओं द्वारा फैलाया गया एपिज़ोओटिक रिंडरपेस्ट दक्षिण दिशा की ओर फ़ैलाने लगा और अंततः दूर दक्षिण अफ्रीका तक पहुंच गया। इथियोपिया में यह अनुमान लगाया गया था कि देश के पशुओं के झुंड में अधिक से अधिक 90 प्रतिशत की मौत हो गई थी जिससे समृद्ध किसान और चरवाहे रातोंरात बेसहारा हो गए थे। इसके अलावा सूखे के साथ-साथ अल नीनो दोलन, चेचक की मानवीय महामारी और कई देशों में जबरदस्त युद्ध की घटनाएं एक साथ घटित हुईं. इथियोपिया का भीषण अकाल जिसने 1888 से 1,892 तक इथियोपिया को सताया था इसमें मोटे तौर पर इसे अपनी एक-तिहाई आबादी की जान गंवानी पड़ी थी। सूडान में इन पहलुओं और महदिस्ट शासन द्वारा लगाये गए अपकर्षणों के मामले में वर्ष 1888 को इतिहास के सबसे भीषण अकाल के रूप में याद किया जाता है। औपनिवेशिक "शान्ति स्थापन" के प्रयास अक्सर गंभीर अकाल का कारण बनते हैं, उदाहरण के लिए जैसा कि 1906 में तंगन्यिका में माजी माजी विद्रोह के दमन के साथ हुआ था। कपास जैसी नकदी फसलों की शुरुआत और इन फसलों को उगाने के लिए किसानों पर दबाव डालने के जबरन प्रयासों ने भी उत्तरी नाइजीरिया जैसे कई क्षेत्रों में किसानों को गरीब बना दिया जिसके कारण 1913 में गंभीर सूखे का सामना होने पर अकाल की स्थिति उत्पन्न होने की संभावना अधिक से अधिक हो गयी थी। हालांकि 20वीं सदी के मध्य भाग के लिए कृषकों, अर्थशास्त्रियों और भूगोलविदों ने अफ्रीका को अकाल के प्रति संवेदनशील नहीं माना था (वे एशिया को लेकर कहीं अधिक चिंतित थे). इसके कई उल्लेखनीय जवाबी-उदाहरण थे जैसे कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान रवांडा का अकाल और 1949 का मलावी का अकाल, लेकिन ज्यादातर अकाल स्थानीयकृत और अल्पकालिक खाद्य पदार्थों की कमी की समस्या से ग्रस्त थे। अकाल की काली छाया सिर्फ 1970 के दशक की शुरुआत में फिर से पड़ी जब इथियोपिया और पश्चिम अफ्रीकी सहेल को सूखे और अकाल का सामना करना पड़ा. उस समय का इथियोपिया का अकाल इस देश में सामंतवाद के संकट के साथ बारीकी से जुड़ा हुआ था और उसी दौरान यह सम्राट हैले सेलास्सी के पतन का कारण बनने में सहायक सिद्ध हुआ। सहेलियाई अकाल अफ्रीका में चारागाहों के धीरे-धीरे बढ़ रहे संकट के साथ जुड़ा हुआ था जिसमें पिछली दो पीढ़ियों में जीवन यापन के एक व्यावहारिक मार्ग के रूप में पशुपालन में कमी देखी गयी थी।

तब से अफ्रीकी अकाल कहीं अधिक निरंतर, अधिक व्यापक और अधिक गंभीर हो गए हैं। कई अफ्रीकी देश खाद्य उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर नहीं हैं जो खाद्य सामग्री के आयात के लिए नकदी फसलों पर निर्भर करते हैं। अफ्रीका में कृषि जलवायु के उतार-चढ़ावों के प्रति अतिसंवेदनशील है, विशेष रूप से सूखे जो स्थानीय स्तर पर खाद्य सामग्री के उत्पादन की मात्रा को कम कर सकते हैं। अन्य कृषि समस्याओं में मिट्टी का बंजरपन, भूमि क्षरण और कटाव, रेगिस्तानी टिड्डियों के झुंड, जो पूरी फसल को नष्ट कर सकते हैं और पशुओं की बीमारियां शामिल हैं। बताया जाता है कि सहारा मरुस्थल का विस्तार प्रति वर्ष 30 मील तक की दर से हो रहा है। सबसे गंभीर अकाल सूखे, गुमराह आर्थिक नीतियों और संघर्ष के संयुक्त कारणों से हुए हैं। उदाहरण के लिए, इथियोपिया में 1983-85 का अकाल इन सभी तीन कारकों का परिणाम था जिसे साम्यवादी सरकार द्वारा उभरते संकट की सेंसरशिप ने और भी बदतर बना दिया था। उसी दौरान सूखे और आर्थिक संकट के साथ-साथ राष्ट्रपति गाफर निमेरी की तत्कालीन सरकार द्वारा किसी तरह की खाद्य सामग्री की कमी से इनकार ने एक ऐसे संकट को जन्म दिया जिसमें संभवतः 250,000 लोग मारे गए थे -- और यह एक मशहूर विद्रोह को जन्म देने में सहायक बना जिसने निमेरी की सत्ता को उखाड़ फेंका.

कई ऐसे कारक हैं जो अफ्रीका में खाद्य सुरक्षा की स्थिति को कमजोर बनाते हैं जिनमें शामिल हैं राजनीतिक अस्थिरता, सैन्य संघर्ष और गृह युद्ध, भ्रष्टाचार और खाद्य सामग्री की आपूर्तियों के संचालन में कुप्रबंधन और व्यापार नीतियां जो अफ्रीकी कृषि को नुकसान पहुंचाते हैं। मानव अधिकारों के हनन के कारण उत्पन्न हुए अकाल का एक उदाहरण 1998 का सूडान का अकाल है। एड्स भी उपलब्ध कार्यबल को कम पर कृषि पर दीर्घ-कालिक आर्थिक प्रभाव डाल रहा है और गरीब परिवारों पर अत्यधिक भार डालकर अकाल के प्रति नए संभावित खतरों को जन्म दे रहा है। दूसरी ओर कुछ अवसरों पर अफ्रीका के आधुनिक इतिहास में अकालों ने तीव्र राजनीतिक अस्थिरता के एक प्रमुख स्रोत के रूप में काम किया है। अफ्रीका में अगर जनसंख्या वृद्धि और मिट्टी के निम्नीकरण का मौजूदा रुझान जारी रहा तो यह महाद्वीप 2025 तक अपनी आबादी के सिर्फ 25% को ही भोजन देने में सक्षम होगा, यह अनुमान यूएनयू के घाना स्थित इंस्टिट्यूट फॉर नेचुरल रिसोर्सेस इन अफ्रीका के मुताबिक़ है।

हाल के उदाहरणों में 1970 के दशक का सहेल का सूखा, 1973 और 1980 के दशक के मध्य मेंइथियोपिया का अकाल, 1970 के दशक के उत्तरार्द्ध में और 1990 तथा 1998 में सूडान का अकाल शामिल है। युगांडा के करामोजा में 1980 का अकाल मृत्यु दर के मामले में इतिहास के सबसे भीषण अकालों में से एक था। इसमें 21% आबादी की मौत हो गयी थी जिसमें 60% नवजात शिशु शामिल थे। 

अक्टूबर 1984 में दुनिया भर के टेलीविजन रिपोर्टों में भूख से मर रहे इथियोपियाई लोगों के फुटेज दिखाए गए थे जिनकी स्थिति कोरेम शहर के निकट स्थित एक खाद्य वितरण केंद्र के आसपास केंद्रित थी। बीबीसी के न्यूज़रीडर माइकल बुअर्क ने 23 अक्टूबर 1984 को इस त्रासदी की एक दिल को छू लेने वाली कमेंट्री प्रस्तुत की थी जिसका वर्णन उन्होंने एक "बाइबलिकल अकाल" के रूप में किया था। इसने एक बैंड ऐड एकल को प्रेरित किया जिसका आयोजन बॉब गेल्डोफ़ द्वारा किया गया और इसमें 20 से अधिक अन्य पॉप सितारों को दिखाया गया। लंदन और फिलाडेल्फिया में लाइव ऐड संगीत कार्यक्रमों द्वारा इस आशय के लिए और अधिक रकम जुटायी गयी। एक अनुमान के मुताबिक़ अकाल की वजह से एक साल के अंदर 900,000 लोगों की मौत हो गयी थी लेकिन माना जाता है कि बैंड ऐड और लाइव ऐड द्वारा जुटायी गयी दसियों लाख पाउंड की रकम ने मृत्यु के कगार पर पहुंचे तकरीबन 6,000,000 अन्य इथियोपियाई लोगों की जिंदगियां बचाईं थी। मूलतः अगर बैंड ऐड और लाइव ऐड की सहायता कभी नहीं पहुँची होती तो इथियोपियाई अकाल से मरने वालों की तादाद अधिक से अधिक 7,000,000 तक या उस समय की आबादी की तकरीबन एक चौथाई तक हो सकती थी।

सन 2000 के बाद के मामले 

2005-06 का नाइजर खाद्य संकट नाइजर के उत्तरी मरादी, टाहौआ, टिल्लाबेरी और ज़िंदर के क्षेत्रों में व्याप्त एक गंभीर लेकिन स्थानीय खाद्य सुरक्षा संकट था। यह स्थिति वर्ष 2004 की बारिश के जल्दी ख़त्म हो जाने, कुछ चारागाह भूमि पर रेगिस्तान टिड्डी द्वारा पहुंचाए गए नुकसानों, उच्च खाद्य कीमतों और चिरकालिक गरीबी के कारण उत्पन्न हुई थी। प्रभावित क्षेत्र में 3.6 मिलियन लोगों में से 2.4 मिलियन लोग खाद्य असुरक्षा के प्रति अत्यधिक संवेदनशील माने जाते हैं। एक अंतरराष्ट्रीय आकलन में कहा गया है कि इनमें से 800,000 से अधिक लोग चरम खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे हैं और अन्य 800,000 लोग मामूली असुरक्षित खाद्य परिस्थितियों में हैं जिन्हें सहायता की जरूरत है।यूरोपियन कमीशन के सहायता समूह ने थर्सडे को बताया कि 2010 के सहेल के अकाल ने नाइजर में लाखों लोगों को प्रभावित किया और सहारा मरुस्थल के दक्षिण में सहेल क्षेत्र के देशों में अनिश्चित बारिश से खेती को नुकसान पहुंचाए जाने के बाद संपूर्ण पश्चिम अफ्रीका को खाद्य सामग्रियों की कमी का सामना करना पड़ा. उन्होंने नाइजर, चाड, उत्तरी बुर्किना फासो और उत्तरी नाइजीरिया जैसे देशों के बारे में बताया कि 2009/2010 में खेती के मौसम में अनियमित बारिश के परिणाम स्वरूप इन देशों में खाद्यान्न उत्पादन में भारी कमी आ गयी है। उन्होंने कहा कि सहायता जुटाने के लिए संयुक्त राष्ट्र और शेष अंतरराष्ट्रीय समुदाय की ओर से मजबूत नेतृत्व की आवश्यकता होगी। "अगर हम काफी तेजी से, काफी पहले से काम करते हैं तो अकाल की स्थिति उत्पन्न नहीं होगी. अगर हम ऐसा नहीं करते हैं तो एक गंभीर खतरा बना रहेगा. "

6 जुलाई को मेथोडिस्ट रिलीफ एंड डेवलपमेंट फंड (एमडीआरएफ) के सहायता विशेषज्ञों ने कहा कि पूरे नाइजर, माली, मोरीतानिया और मोरक्को में एक महीने तक चली तीव्र गर्म हवाओं की वजह से 1,500,000 से अधिक नाइजीरियाई लोगों पर अकाल का खतरा मंडराने लगा था। नाइजर, माली, बुर्किना फासो और मोरीतानिया के संकट-ग्रस्त देशों को लगभग 20,000 पाउंड के एक कोष का वितरण किया गया था।

खाद्य सुरक्षा बढ़ाने की पहल 
राष्ट्र या बाजार के माध्यम से परंपरागत हस्तक्षेपों की एक पृष्ठभूमि के खिलाफ खाद्य सुरक्षा की समस्या से निबटने के लिए वैकल्पिक पहल करने का बीड़ा उठाया गया है। इसका एक उदाहरण कृषि विकास के लिए "समुदाय क्षेत्र के आधार पर विकास का दृष्टिकोण" ("सीएबीडीए") है जो अफ्रीका में खाद्य सुरक्षा बढ़ाने के लिए एक वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रदान करने के उद्देश्य से चलाया गया एक एनजीओ कार्यक्रम है। सीएबीडीए हस्तक्षेप के विशिष्ट क्षेत्रों जैसे कि सूखा-प्रतिरोधी फसलों की शुरुआत और खाद्यान्न उत्पादन की नयी विधियों जैसे कि कृषि वानिकी के माध्यम से अपना काम करती है। 1990 के दशक में इथियोपिया में प्रायोगिक रूप से संचालित इस विधि का प्रसार मलावी, युगांडा, इरिट्रिया और केन्या तक हो गया है। इस कार्यक्रम के ओवरसीज डेवलपमेंट इंस्टिट्यूट के एक विश्लेषण में सीएबीडीए द्वारा व्यक्तिगत और सामुदायिक क्षमता-विकास पर ध्यान केंद्रित किये जाने को रेखांकित किया गया है। यह समुदाय द्वारा संचालित संस्थानों के माध्यम से किसानों को अपने स्वयं के विकास को प्रभावित करने और तेज करने में सक्षम बनाता है जो उनके घरों और क्षेत्र के लिए खाद्य सुरक्षा की स्थिति लेकर आता है।

एशिया में अकाल

कंबोडिया 
राजधानी नाम पेन्ह में 1975 में खेमर रूज ने प्रवेश कर कम्बोडिया का नियंत्रण अपने पास ले लिया। पोल पाट के नेतृत्व में नई सरकार ने कम्युनिज्म के बुनियादी आदर्शों को को लागू करते हुए सभी शहरी आवासियों को देहाती क्षेत्रों में सामुदायिक खेतों और नागरिक कार्यों की परियोजनाओं के लिए काम करने हेतु भेज दिया। बिना बाहरी सहायता के और युद्ध के पिछले चार वर्षों में 75 % उपयोगी जानवरों की मौत के कारण और आदर्शवादियों के द्वारा लिखित कृषि मार्गदर्शनों व उत्साही केडर के निरीक्षण में हुए कार्यों के कारण, देश शीघ्र ही अकाल की गर्त में समा गया। कोई भी अंतर्राष्ट्रीय राहत तब तक नहीं आई, जब तक कि 1979 में वियतनामी सेना ने आक्रमण कर देश को मुक्त नहीं कर दिया। जब पोल पाट सत्ता में थे तब कुल आठ मिलियन आबादी में से एक से तीन मिलियन लोग मर गए। कई को मार डाला गया व अधिकांश कुपोषण व अत्यधिक थकान के कारण मर गए और तब अनुपयुक्त व लापरवाह सरकारी अधिकारियों के कारण अकाल की स्थिति उत्पन्न हो गई।.

चीन 

चीनी विद्वानों ने ईसा पूर्व 108 से 1911 तक किसी न किसी प्रान्त में हुई 1828 अकाल की घटनाओं की गणना की है - जो औसतन लगभग एक अकाल प्रति वर्ष है। 1933 से 1937 के बीच हुए एक भयंकर अकाल में 6 मिलियन चीनी मर गए थे। चार अकाल जो 1810, 1811, 1846 और 1849 में आये थे, उनके लिए कहा जाता है कि उनमे कम से कम 45 मिलियन व्यक्ति मारे गए थे। ताइपिंग बगावत के कारण 1850 से 1873 की अवधि में, सूखे व अकाल की वजह से चीन की आबादी में 60 मिलियन से अधिक की कमी आई. चीन के क्विंग वंश की नौकरशाही ने अकाल कम करने पर विस्तृत रूप से ध्यान दिया उसे एल नीनो - दक्षिण से सम्बन्धित सूखे व बाढ़ के कारण होने वाली अकाल घटनाओं को टालने का श्रेय मिला। इन घटनाओं की तुलना कुछ कम मात्रा में चीन के 19 वीं सदी के विस्तृत अकालों की पारिस्थितिक घटनाओं से की जा सकती है। (पियरे -एटिन विल, ब्योरोक्रेसी एंड फेमिन) क्विंग चीन ने राहत के प्रयास किये, जिसमें शामिल थे विशाल प्रमाण में खाद्यान्न भेजना और वह एक जरूरत थी जिससे अमीरों ने गरीबों व मूल्य नियमन के लिए अपने भंडारगृह खोल दिए और यह शासन की ओर से किसानों को दी जाने वाली निर्वाह की गारंटी के भाग के रूप में था (मिंग -शेंग के रूप में जाना गया).

उन्नीसवीं सदी के मध्य में जब एक तनावग्रस्त साम्राज्य राज्य प्रबंधन से हट गया और अनाज को सीधे ही आर्थिक दानशीलता के लिए भेजा जाने लगा, तब वह प्रणाली समाप्त हो गई। इस प्रकार तोंगाज़ी पुनर्स्थापना के अंतर्गत 1867-68 के अकाल से सफलतापूर्वक निजात पा लिया गया, लेकिन 1877-78 में विशाल उत्तरी चीन में जो अकाल आया वह उत्तरी चीन में आये सूखे के कारण आया महाविनाश था। शांक्सी प्रांत में आबादी उल्लेखनीय रूप से कम होने लगी, क्योंकि अनाज ख़त्म हो गया था और भूखे लोगों ने हताशा में जंगलों, खेतों व अपने घरों को भी अनाज के लिए उजाड़ दिया था। अनुमानित मृत्यु संख्या 9.5 से 13 मिलियन व्यक्तियों की है। (माइक डेविस, लेट विक्टोरियन होलोकास्ट्स).

ग्रेट लीप फॉरवर्ड (बड़ी छलांग) 
सबसे बड़ा अकाल 20 वीं सदी का, बल्कि सभी समय के दौर का, चीन का 1958-61 का ग्रेट लीप फॉरवर्ड अकाल रहा है। इस अकाल का तात्कालिक कारण था माओ जेडोंग द्वारा चीन को कृषि राष्ट्र से एक औद्यगिक राष्ट्र के रूप में मात्र एक बड़ी छलांग के द्वारा दुर्भाग्य पूर्ण ढंग से रूपांतरित कर देने का प्रयास. पूरे चीन में कम्युनिस्ट पार्टी के केडर आग्रह करते थे कि किसानों को अपने खेतों को सामूहिक खेती के लिए त्याग देना चाहिए और छोटे कारखानों में स्टील का उत्पादन आरम्भ कर देना चाहिए, इस प्रक्रिया में कई बार उनके खेती के औजार भी पिघल जाते थे। सामूहिकीकरण ने कृषि में श्रम व स्त्रोतों को निरुत्साह किया, विकेन्द्रित धातु उत्पादन की अवास्तविक योजनाओं ने आवश्यक श्रम को क्षति पहुंचाई, मौसम की प्रतिकूल स्थितियों व सामुदायिक भोजन कक्षों ने उपलब्ध खाद्यान्न की फिजूल खपत को प्रोत्साहित किया। (देखें चांग जी व वेन जी (1997) "कम्युनल डायनिंग एंड द चायनीज फेमिन 1958-1961"). सूचना पर केन्द्रित नियंत्रण व पार्टी केडर पर अत्यधिक दबाव की स्थिति ऐसी थी कि केवल सही खबर की रिपोर्ट ही दी जाती थी - जैसे कि उत्पादन लक्ष्य को पूरा कर लिया गया या उत्पादन उससे भी अधिक रहा- बढ़ते विनाश की सूचनाओं को प्रभावी ढंग से दबा दिया जाता था। अकाल की स्थिति की जानकारी जब नेतृत्व को हुई तब प्रतिसाद के रूप में उसने थोड़ा काम किया और इस महाविनाश पर किसी भी प्रकार की चर्चा करने पर अपना प्रतिबन्ध जारी रखा। समाचारों को दबाने की यह व्यापक क्रिया इतनी प्रभावी थी कि अकाल की गंभीरता से कुछ चीनी ही वाकिफ थे और 20 वीं सदी के शांतिकाल में हुए उस जनसंख्या महाविनाश की जानकारी बीस वर्ष बाद सबको तब ही मालूम हुई, जब सेंसरशिप का पर्दा उठना प्रारंभ हो गया।

अनुमान लगे जाता है कि 1958-61 के अकाल से मृत्यु संख्या 36 से बढ़ कर करीब 45 मिलियन की रही, साथ में 30 मिलियन की संख्या उन जन्मों की थी जिन्हें रद्द कर दिया गया या लंबित कर दिया गया।  अकाल जब विकराल रूप में अपने परिणाम लाया, तब माओ ने कृषि सामूहिक योजनाओं को बलपूर्वक पलटा और 1978 में प्रभावी ढंग से उन्हें समाप्त कर दिया गया। चीन ने 1961 के बाद बड़ी अग्रिम छलांग की तुलना में और किसी अकाल को अनुभव नहीं किया।

भारत 
मानसून वर्षा पर लगभग पूरी तरह से निर्भर रहने से फसल की असफलता के कारण भारत भी काफी असुरक्षित रहा और इससे अकाल की स्थिति गंभीर होती रही।  भारत में 11 वीं से 17 वीं सदी के बीच कुल 14 अकाल हुए (भाटिया 1985). उदाहरण के रूप में 1022-1033 के बीच बड़े अकालों के कारण भारत के सभी प्रांत लगभग जनसंख्या विहीन हो गए थे। डेक्कन के अकाल में 1702-1704 में कम से कम 2 मिलियन व्यक्ति मर गए। बी. एम. भाटिया का मानना है कि पहले के अकालों को स्थानीकृत किया गया था और 1860 के पश्चात ही ब्रिटिश शासन में देश में खाद्यान्न की सामान्य कमी अकाल से सम्बद्ध रही। लगभग बड़े 25 अकाल आये जो 19 वीं सदी के उत्तरार्ध में दक्षिण में तमिलनाडु व पूर्व में बिहार व बंगाल जैसे राज्यों में फैले थे।

रमेश चन्दर दत्त 1900 में व वर्तमान काल के विद्वान जैसे कि अमर्त्य सेन सहमत हैं कि इतिहास में दर्ज कुछ अकाल तो असमान वर्षा व उन ब्रिटिश आर्थिक व प्रशासनिक योजनायों का संयुक्त प्रतिफल थे, जिसमें 1857 से स्थानीय कृषि भूमि का कब्ज़ा कर विदेशी स्वामित्व के वृक्षारोपण के लिए उसे रूपांतरित करना, आंतरिक व्यापार पर प्रतिबन्ध, अफगानिस्तान के अभियान के लिए ब्रिटेन को सहारा देने के लिए भारतीय नागरिकों पर भारी कर (देखें सेकण्ड एंग्लो -अफगान वार), मुद्रास्फीति कार्य जिससे कि खाद्यान्न की कीमतों में वृद्धि और भारत से ब्रिटेन में प्रमुख आहार का उल्लेखनीय मात्रा में निर्यात सम्मिलित थे। (दत्त,1900 एवं 1902, श्रीवास्तव 1968, सेन 1982, भाटिया 1985). कुछ ब्रिटिश नागरिकों जैसे कि विलियम डिग्बी ने योजना सुधारों व अकाल राहत कार्यों के लिए आन्दोलन किया लेकिन भारत के तत्कालीन वायसराय लार्ड लायटन ने इन परिवर्तनों का विरोध किया क्योंकि उनका अनुमान था कि इससे भारतीय कर्मियों में कामचोरी को प्रोत्साहन मिलेगा. बंगाल का प्रथम अकाल जो 1770 में हुआ उसमें अनुमानतः लगभग 10 मिलियन लोगों की मृत्यु हुई थी, जो उस समय के बंगाल की आबादी का एक तिहाई था। अन्य उल्लेखनीय अकालों में सम्मिलित हैं 1876-78 का बड़ा अकाल जिसमें 6.1 मिलियन से 10.3 मिलियन लोगों की मौत हुई व भारतीय अकाल 1899-1900 का जिससे 1.25 से 10 मिलियन व्यक्तियों की मौत हुई।  बंगाल के 1943-44 के अकाल सहित अकाल आजादी वर्ष 1947 तक जारी रहे, यद्यपि कोई फसल प्राप्त करने की असफलता नहीं थी, लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 1.5 मिलियन से 3 मिलियन बंगाली मारे गए।

अकाल आयोग ने 1880 में अवलोकनों के द्वारा इस तथ्य को पुष्ट किया कि अकालों के लिए खाद्यान्न कमी उतनी जवाबदेह नहीं है जितना कि खाद्यान्न वितरण का प्रबंधन है। उन्होंने पाया कि ब्रिटिश भारत के प्रत्येक प्रान्त में जिसमें बर्मा भी शामिल था, वहां खाद्यान्न का आधिक्य था और वार्षिक आधिक्य 5.6 मिलियन टन था (भाटिया 1970). उस दौरान चावल व अन्य अनाजों का भारत से वार्षिक निर्यात लगभग एक मिलियन टन था।

वर्ष 1966 में बिहार भी अकाल की कगार पर था, जब अकाल से निबटने के लिए यूनाइटेड स्टेट्स ने 900,000 टन अनाज आवंटित किया था। भारत में तीन वर्षों के सूखे के परिणाम स्वरूप लगभग 1.5 मिलियन मौतें भूख व रोगों के कारण हुई।

जापान 
एक शासी निकाय के अनुसार 1603 से 1868 के बीच इदो अवधि में कम से कम 130 अकाल हुए थे जिनमें से 21 उल्लेखनीय थे।

मध्य पूर्व 
उदाहरण के रूप में इराक ने 1801, 1827 व 1831 में अकालों का सामना किया। अनातोलिया में 1873-74 में एक बड़ा अकाल आया जिसमें सैकड़ों- हजारों व्यक्तियों की मौत हुई। 

ऐसा विश्वास किया जाता है कि 1870-1871 में हुए बड़े पर्शियन अकाल में पर्शिया (आज का इरान) में 1.5 मिलयन व्यक्तियों की मौत हुई जो पर्शिया की कुल अनुमानित आबादी 6-7 मिलियन के 20-25 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करती है।

लेबनान विदेश से खाद्यान्न आयातों पर अत्यधिक निर्भर रहा, इसलिए प्रथम विश्व युद्ध के दौरान वह देश, अनाज के मामले में अधिक नाजुक स्थिति में था। युद्ध के समाप्त होने पर अकाल में लेबनान की 4,50,000 आबादी में से 100,000 व्यक्तियों की मृत्यु हुई।

उत्तर कोरिया 
उत्तर कोरिया में 1990 के दशक के मध्य में अभूतपूर्व बाढ़ों के कारण अकाल आये। आत्मनिर्भर अर्थतंत्र वाले इस शहरी औद्योगिक समाज ने इसके पूर्व के दशकों में बड़े पैमाने पर कृषि से औद्योगिकीकरण के द्वारा खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता प्राप्त की थी। फिर भी अर्थतंत्र प्रणाली सोवियत संघ व चीन गणतंत्र से प्राप्त बड़ी रियायती जीवाश्म इंधन की सहायता पर निर्भर रही। लेकिन जब सोवियत संघ विघटित हो गया और चीन का बाजार तंत्र पूर्ण कीमत के आधार पर कठोर मुद्रा की और उन्मुख हो गया, तब उत्तर कोरिया की अर्थव्यवस्था लड़खड़ा गई। नाजुक कृषि क्षेत्र में 1995-96 में बड़ी असफलता का अनुभव हुआ और उससे 1996-99 में विस्तृत अकाल आया। अनुमान है कि भूख से 600,000 व्यक्ति मरे (अन्य के अनुमान के अनुसार यह संख्या २००,००० से लेकर 3.5 मिलियन की है). अब तक उत्तर कोरिया में खाद्य आत्म निर्भरता नहीं आई है और वह चीन, जापान, दक्षिण कोरिया व यूनाइटेड स्टेट्स से प्राप्त बाह्य खाद्यान्न सहायता पर आश्रित रहता है। जबकि वू कमिंग्स ने अकाल के एफएडी की ओर ध्यान केन्द्रित किया है, लेकिन मून का तर्क है कि एफएडी ने प्रोत्साहन के ढांचे को अधिकारवादी शासन की ओर कर लिया है, जिससे मताधिकार से वंचित कई मिलियन व्यक्ति भूख से मरने को मजबूर हो गए हैं (मून, 2009).

वियतनाम 
वियतनाम में कई अकाल आये हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान के कब्जे के कारण वियतनाम में 1945 में अकाल आया जिससे 2 मिलियन मौतें हुई जो वहां की तत्कालीन आबादी का 10% था।  वियतनाम युद्ध के पश्चात देश के एकीकरण के समय वियतनाम में 1980 के दशक में खाद्यान्नों की कमी महसूस की गई जिसने कई व्यक्तियों को देश छोड़ने के लिए प्रेरित किया।

यूरोप में अकाल

पश्चिमी यूरोप 
सन् 1315 से 1317 (या 1322 तक) का भीषण अकाल पहला बड़ा खाद्य संकट था जिसने यूरोप को 14वीं शताब्दी में घेरे रखा। उत्तरी यूरोप में कई वर्षों तक लाखों लोग मारे गए, अकाल ने 11वीं और 12वीं शताब्दी की समृद्धि को नष्ट कर दिया।  अकाल 1315 की बसंत ऋतु में खराब मौसम के साथ शुरू हुआ और फसलों का व्यापक नुकसान 1317 की गर्मियों तक जारी रहा, जिससे यूरोप 1322 तक उबर नहीं पाया। इस अवधि को बड़े पैमाने पर आपराधिक गतिविधियों, बीमारियों और जनसंहारों, शिशुहत्याओं और निष्ठुरता के काल के रूप में याद रखा गया। यह अकाल चौदहवीं शताब्दी में चर्च, राज्य, यूरोपियन समाज और भविष्य की आपदाओं पर अपने प्रभाव छोड़ गया। उस दौरान मध्यकालीन ब्रिटेन 95 अकालों, और फ़्रांस 75 या उससे अधिक अकालों से प्रभावित हुआ़. 1315-6 के अकाल में इंग्लैंड की कम से कम 10% आबादी या कम से कम 500,000 लोग मारे गए।

17वीं शताब्दी का समय यूरोप में खाद्य उत्पादकों के लिए परिवर्तन का काल था। शताब्दियों तक वे सामंतवादी व्यवस्था में कृषि पर गुजारा करने वाले किसानों के रूप में रहे थे। वे अपने मालिकों के ऋणी थे, जिनके पास अपने किसानों द्वारा जोती गई जमीन के विशेषाधिकार थे। जागीर का मालिक वर्ष भर में उत्पादित फसल और पशुधन का एक भाग लेता था। किसान सामान्यतया कृषि खाद्य उत्पादन में किए गए काम को न्युनतम करने की कोशिश करते थे। उनके मालिक उन पर खाद्य उत्पा‍दन बढ़ाने के लिए बहुत ही कम जोर डालते थे, जब आबादी बढ़ने लगी केवल तब किसानों ने खुद ही उत्पादन बढ़ाना शुरू कर दिया। जुताई के लिए अधिक से अधिक जमीन का उपयोग किया गया जबतक कोई जमीन बची ही नहीं और किसान अधिक श्रम आधारित पद्धतियां अपनाने को मजबूर हुए. जब तक कि उनके पास अपने परिवार को खिलाने के लिए पर्याप्त भोजन था तब तक वे अपना समय दूसरे कामों जैसे शिकार करने, मछली पकड़ने या आराम करने में बिताना पसंद करते थे। जितना खाना वे खा सके या खुद के लिए संग्रहीत कर सके उससे ज्यादा उत्पादन करना आवश्यक नहीं था।

17वीं शताब्दी के दौरान पिछली शताब्दियों के प्रचलन को जारी रखते हुए बाजार-चालित कृषि में बढ़ोतरी हुई। खासतौर पर पश्चिमी यूरोप में किसान, वे लोग जिन्होंने भूमि के उत्पादों से लाभ कमाने के लिए भूमि उधार दी थी और मजदूरी पाने वाले मजदूर तेजी से आम बात हो गए। उत्पाद को मांग वाले क्षेत्र में ज्यादा से ज्यादा बेचने के लिए जितना संभव हो सके उतना अधिक उत्‍पादन करना उनके हित में था। उन्होंने हर साल फसल में बढ़ोतरी की जब भी वे कर पाए. किसानों ने अपने मजदूरों का भुगतान पैसों से किया इसने ग्रामीण समाज में व्यवसायीकरण को बढ़ावा दिया। इस व्यवसायीकरण ने किसानों के व्यावहार पर गहरा प्रभाव डाला। किसान अपनी भूमि पर श्रमिक इनपुट को बढ़ाने में रुचि रखने लगे थे, न कि कृषि पर गुजारा करने वाले किसानों की तरह इनपुट घटाने में.

कृषि पर गुजारा करने वाले किसान भी बढ़ते हुए करों के कारण अपनी गतिविधियों को व्यवसायीकृत करने के लिए बाध्य हो गए। करों का भुगतान केंद्र सरकार को पैसों में करना होता था जिसने किसानों को उनकी फसल को बेचने हेतु बाध्य किया। कई बार उन्होंने औद्योगिक फसलों का उत्पादन किया, लेकिन उनकी खाद्य आवश्यकताओं और कर बाध्यताओं को पूरा करने के लिए उत्पादन बढ़ाने हेतु उन्होंने कई रास्ते ढूंढ़े. किसानों ने इस नए धन को उपयोग निर्मित वस्तुएओं को खरीदने के लिए भी किया। कृषि और सामाजिक विकास ने खाद्य उत्पादन को बढ़ावा दिया जो पूरी 16वीं शताब्दी में अपना स्थान लेता रहा लेकिन सत्रहवीं शताब्दी में जब यूरोप ने सत्रहवीं शताब्दी के प्रारंभ में खुद को खाद्य उत्पा‍दन के लिए विपरीत परिस्थिातियों में पाया तब यह प्रत्यक्ष रूप से और बढ़ गया – सोहलवीं शताब्दी के अंत में पृथ्वी के तापमान में गिरावट का दौर था।

1590 के दशक में कुछ निश्चित क्षेत्रों विशेष तौर पर नीदरलैंड को छोड़कर पूरे यूरोप में कई शताब्दियों का सबसे भीषण अकाल देखने को मिला। तुलनात्मक रूप से 16वीं शताब्दी के दौरान अकाल दुर्लभ हो गए थे। जैसा कि अपेक्षाकृत शांति की लंबी अवधि के दौरान अधिकतर देखा जाता है, अर्थव्यवस्था एवं आबादी में सतत विकास दर्ज किया गया। चूंकि किसान काम को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक बांटने का प्रयास करते हैं, इसलिए कृषि पर गुजारा करने वाले किसानों की जनसँख्या भी लगभग हमेशा ही बढ़ती है। हांलाकि सघन जन आबादी वाले क्षेत्रों जैसे उत्तरी इटली में किसानों ने प्रौमिस्क्युअस कल्चर जैसी तकनीकों से अपनी भूमि की पैदावार को बढ़ाना सीख लिया था, लेकिन वे अभी भी अकालों से असुरक्षित थे, इसने उन्हें अपनी भूमि पर और अधिक सघनता से कार्य करने हेतु बाध्य किया।

अकाल बेहद अस्थिर करने वाली और विनाशकारी घटनाएं होती है। भुखमरी की संभावना ने लोगों को जोखिम भरे कदम उठाने हेतु बाध्य किया। जब खाद्य पदार्थों का अभाव नज़र आने लगा तो वे अल्पकालीन उत्तर जीविता के लिए दीर्घकालीन समृद्धि से समझौता करने लगे। बाद के वर्षों में घटते उत्पादन के कारण वे अपने बोझा उठाने वाले पशुओं को मारने लगे। वे अगले वर्ष की फसल से समझौता करते हुए इस उम्मीद के साथ कि उन्हें और बीज मिल जाएंगे वे अपने बीज के दाने भी खाने लगे। एक बार जब ये साधन भी समाप्त होने लगे उन्होंने खाने की खोज में नई राह पकड़ ली। वे उन शहरों में चले गए जहां अन्य‍ क्षेत्रों से खाद्य पदार्थ बेचने के लिए व्यापारियों के आने की संभावना थी क्योंकि शहरों में क्रय शक्ति ग्रामीण क्षेत्रों से अधिक थी। शहरों में व्यवस्था को बनाए रखने के लिए राहत कार्यक्रम चलाए गए थे और वहां की जनता के लिए अनाज लाया गया था। प्रवासियों की निराशा और असमंजस वाली स्थिति के कारण अक्सत अपराध भी बढ़ जाया करते थे। कई किसान पर्याप्ता खाना पाने के लिए डाका भी डालने लगे।

एक अकाल अक्सर बाद के वर्षों में बीज की कमी या दिनचर्या में व्यवधान या श्रम की कमी के कारण अपने साथ कई कठिनाईया भी लेकर आता था। अकालों को अक्सर दैवी कोप के रूप में समझा जाता था। अकालों को ईश्वर द्वारा पृथ्वी के लोगों को दिए गए उपहारों को वापस ले लेने के रूप में देखा जाता था। अकाल के रूप में ईश्वर के क्रोध से बचने के लिए विस्तृत जुलूस और धार्मिक कृत्य किए जाने लगे।

1590 के भीषण अकाल से अकालों के समय की शुरुआत हुई और 17वीं शताब्दी में इनमें कमी आई. जनसंख्या की तरह पूरे यूरोप में अनाज के दाम भी बढ़ गए थे। 1590 में विभिन्न क्षेत्रों में हुई खराब सिंचाई के कारण विभिन्न प्रकार के लोग असुरक्षित हो गए थे। ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ती हुई श्रमिक संख्या भी असुरक्षित थी क्योंकि उनके पास खुद का भोजन नहीं था और एक खराब फसल के वर्ष में उनके पास खरीदने के लिए भी पर्याप्त धन नहीं था। कस्बों के श्रमिक भी खतरे में थे क्योंकि उनका वेतन भी अनाज की कीमत को पूरा करने के लिए अपर्याप्त था, वे खराब फसल के वर्ष में अक्सर कम मजदूरी प्राप्त करते थे क्योंकि धनी लोग अपनी उपलब्ध आय को अनाज खरीदने के लिए व्याय करते थे। अक्सर बेरोजगारी का परिणाम अनाज के दामों में वृद्धि के रूप में होता था जिस कारण शहरी गरीब लोगों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी होती रहती थी।

यूरोप के सभी क्षेत्र खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्र इस दौरान अकाल से बुरी तरह प्रभावित हुए. नीदरलैंड जोकि अकाल के सबसे बुरे प्रभावों से बचने में सफल रहा था लेकिन 1590 का वर्ष वहां पर भी कठिन था। एम्सटर्डम अनाज व्यापार (बाल्टिक के साथ) जिसके लिए वास्तकविक अकाल नहीं घटा था, ने इस बात की गारंटी दी कि नीदरलैंड में हमेशा कुछ न कुछ खाने को होगा यद्यपि भुखमरी प्रबल थी।

इस समय नीदरलैंड के पास पूरे यूरोप में सबसे ज्यादा व्यसायीकृत कृषि थी, कई औद्योगिक फसलें जैसे फ्लैक्स, हैम्प और होप्स उगाई जा रही थी। कृषि अधिक से अधिक विशिष्ट और कुशल हो गई थी। परिणामस्वरूप उत्पादकता और धन बढ़ा जिसने नीदरलैंड को नियमित खाद्य आपूर्ति बनाए रखने में मदद की। 1620 तक अर्थव्यवस्था और भी विकसित हो चुकी थी इसलिए नीदरलैंड अकाल के समय की परेशानियों और यहां तक कि घोर पीड़ा से भी बचे रहने में सफल रहा था।

सन 1620 के आसपास पूरे यूरोप में अकाल फैलने का दूसरा दौर दिखाई पड़ा. हालांकि पच्चीस बरस पहले के अकालों के मुकाबले आमतौर पर इनकी गंभीरता काफी कम थी, लेकिन फिर भी कई इलाकों में इन्होंने काफी गंभीर रूप धारण कर लिया था। 1696 का फिनलैंड का भीषण अकाल, जो सन 1600 के बाद का संभवतः सबसे विनाशकारी अकाल था, ने उस देश की एक-तिहाई आबादी को मौत के मुंह में धकेल दिया था। 

1693 और 1710 के बीच फ्रांस में दो बड़े अकालों का प्रकोप आया और इसने 20 लाख से अधिक लोगों को खत्म कर दिया। दोनों मामलों में फसल खराब होने से पैदा हालात को लड़ाई के दौरान खाद्य आपूर्ति की मांग ने और ज्यादा खराब कर दिया। 

यहां तक कि स्कॉटलैंड को 1690 के दशक के अंत में भी अकाल झेलना पड़ा जिसके कारण स्कॉटलैंड के कुछ हिस्सों की आबादी में 15% की घटोत्तरी देखी गयी।

1695-96 के अकाल ने नॉर्वे की लगभग 10% जनसंख्या को खत्म कर दिया।  स्कैंडिनेवियाई (संयुक्त रूप से डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन, फिनलैंड व आइसलैंड) देशों में 1740 और 1800 के बीच कम से कम नौ बार भीषण रूप से फसल खराब होना दर्ज किया गया, जिसमें से हर एक के परिणाम स्वरूप मृत्यु दर में अच्छी-खासी बढ़ोत्तरी देखी गयी।

1740-43 के दौर में बेहद ठंडी सर्दियां और गर्मियों में भयानक सूखा देखा गया जिसकी वजह से पूरे यूरोप में अकाल फैला और मृत्यु दर में अचानक तेज बढ़ोत्तरी हो गई। (डेविस द्वारा लिखित, लेट विक्टोरियन होलोकास्ट, पृष्ठ 281 में उल्लेखित) यह संभावना है कि 1740-41 की बेहद ठंडी सर्दी, जिसकी वजह से उत्तरी यूरोप में बड़े पैमाने पर अकाल फैला, उसका मूल कारण एक ज्वालामुखी विस्फोट रहा हो। 

महा अकाल, जो 1770 से 1771 तक चला, ने चेक गणराज्या की आबादी के लगभग दसवें हिस्से, या 250,000 निवासियों को खत्म कर दिया और ग्रामीण इलाकों में बदलाव की अलख जगाई जिसने किसान विद्रोहों को जन्म दिया। 

यूरोप के अन्य इलाकों में तो अकाल काफी हाल तक भी आते रहे हैं। फ्रांस ने उन्नीसवीं शताब्दी में अकाल का सामना किया। पूर्वी यूरोप में 20वीं शताब्दी के दौरान भी अकाल आते रहे हैं।

अकाल की आवृत्ति जलवायु परिवर्तन के साथ बदल सकती है। उदाहरण के लिए, 15वीं सदी से 18वीं सदी के लघु हिम युग के दौरान, यूरोपीय अकालों की आवृत्ति में पिछली सदी की तुलना में लगातार वृद्धि हुई।

कई समाजों में अक्सर अकाल पड़ने के कारण ये काफी लंबे समय से सरकारों और अन्य प्राधिकरणों के लिए चिंता का एक प्रमुख विषय रहा है। पूर्व-औद्योगिक यूरोप में, अकाल को रोकना और समय पर भोजन की आपूर्ति सुनिश्चित करना कई सरकारों की प्रमुख चिंताओं में से एक था, जिसकी वजह से वे अकाल के प्रकोप को कम करने के लिए मूल्य नियंत्रण, अन्य क्षेत्रों से भोजन के भंडार खरीदना, वितरण नियंत्रण और उत्पादन नियंत्रण जैसे विभिन्न उपायों को लागू करती रही हैं। अधिकांश सरकारें अकाल से चिंतित रहती थीं क्योंकि यह विद्रोह और सामाजिक विघटन के अन्य रूपों को जन्म दे सकता था।

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान नीदरलैंड में अकाल फिर लौट आया जिसे होंगरविंटर के रूप में जाना गया। यह यूरोप का अंतिम अकाल था जिसमें लगभग 30,000 लोग भुखमरी का शिकार हुए. यूरोप के कुछ अन्य क्षेत्रों में भी उसी समय में अकाल का अनुभव किया गया।

इटली 
फसल विफलता उत्तरी इतालवी अर्थव्यवस्था के लिए काफी विनाशकारी साबित हुई। क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पिछले अकालों से अच्छी तरह उबरने में सक्षम रही थी, लेकिन 1618 से 1621 के अकाल युद्ध की अवधि के दौरान ही आये। अर्थव्यवस्था सदियों तक पूरी तरह से उबर नहीं पाई. पूरे उत्तरी इटली में 1640 के दशक के अंतिम वर्षों में गंभीर और 1670 के दशक में कम गंभीर अकाल आये।

उत्तरी इटली में, 1767 की एक रिपोर्ट में कहा गया कि वहाँ पिछले 316 वर्षों (अर्थात 1451-1767 की अवधि) में से 111 वर्षों में अकाल आया था और सिर्फ सोलह वर्षों में अच्छी पैदावार हुई थी।

स्टीफन एल. डाइसन और रॉबर्ट जे. रोलैंड के अनुसार, "केलियरी की जेसुइट्स [सार्डिनिया में] ने 1500वीं सदी के अंत के कुछ ऐसे वर्षों का वर्णन किया है "जिनके दौरान इतनी भीषण भुखमरी तथा बंजरता देखी गयी कि ज्यादातर लोगों को अपनी जान बचाने के लिए जंगली पेड़-पौधों का सहारा लेना पड़ा" ... कहा जाता है कि 1680 के भयानक अकाल के दौरान, 250,000 की कुल जनसंख्या में से लगभग 80000 लोग मारे गए और पूरे गांव के गांव तबाह हो गए थे। .."

इंग्लैंड 
1536 से इंग्लैंड में गरीबों से संबंधित कानून बनाने शुरू किये गए जिनमें इलाके के धनी लोगों पर वहां के गरीबों के निर्वहन की कानूनी जिम्मेदारी डालने की बात कही गयी। अंग्रेजी कृषि उद्योग नीदरलैंड से पिछड़ा हुआ था, लेकिन 1650 तक उसने अपने कृषि उद्योग का व्यापक पैमाने पर व्यवसायीकरण कर लिया। इंग्लैंड में शांति के समय का आखिरी अकाल 1623-24 आया। वहाँ नीदरलैंड के समान ही अभी भी कभी-कभार भुखमरी देखी जाती थी, लेकिन वहाँ अब पहले के तरह के और अकाल नहीं आये। गरीबों के भोजन में आलू की बढ़ती महत्ता के बावजूद बढ़ती आबादी ने खाद्य सुरक्षा पर निरंतर दबाव बनाए रखा। कुल मिलाकर, इंग्लैंड में आलू से खाद्य सुरक्षा में वृद्धि हुई जहां गरीबों के प्रधान भोजन के रूप में वे रोटी के जगह कभी नहीं ले पाए. इस बात की संभावन अत्यंत कम थी कि जलवायु स्थितियां एक साथ गेहूं और आलू, दोनों की फसलों के लिए घातक हों.

आइसलैंड 
ब्राइसन (1974) के अनुसार, 1500 और 1804 के बीच आइसलैंड में सैंतीस वर्षों में अकाल पड़े थे।

1783 में दक्षिण मध्य आइसलैंड में ज्वालामुखी लाकी भड़क उठा. लावा से प्रत्यक्ष क्षति तो अधिक नहीं हुई, लेकिन लगभग पूरे देश में राख और सल्फर डाइऑक्साइड फ़ैल जाने के कारण वहां का लगभग तीन-चौथाई पशु-धन नष्ट हो गया। उसके बाद आने वाले अकाल में लगभग दस हजार लोग मारे गए, जो आइसलैंड की तत्कालीन जनसंख्या का पांचवां हिस्सा था। [असिमोव, 1984, 152-153]

आइसलैंड 1862 से 1864 के बीच एक आलू अकाल से भी ग्रस्त हुआ था। हालांकि आयरिश आलू अकाल की तुलना में इसके बारे में कम ही लोगों को पता है, आइसलैंड का आलू अकाल भी उसी बीमारी के कारण उत्पन्न हुआ था जिसने 1840 के दशक के दौरान अधिकांश यूरोप में तबाही मचाई थी। आइसलैंड की जनसंख्या का लगभग 5 प्रतिशत अकाल के दौरान मौत के मुंह में समा गया।

फिनलैंड 
देश ने गंभीर अकाल झेले हैं और 1696-1697 के अकाल में एक तिहाई जनसंख्या की मौत हुई।  1866-1868 के फिनलैंड के अकाल के कारण 15% जनसंख्या मौत के मुंह में समा गयी थी।

आयरलैंड 
1845-1849 के आयरलैंड के भयंकर अकाल के लिए लॉर्ड रसैल के नेतृत्व वाली यूनाइटेड किंगडम की व्हिग सरकार की नीतियां भी काफी हद तक जिम्मेदार थीं। आयरलैंड में ज्यादातर भूमि अंग्रेजी मूल के ऐंजलीकन लोगों के स्वामित्व में थी, जो सांस्कृतिक या जातीय रूप से आयरिश आबादी के साथ जुड़े नहीं थे। जमींदार एंग्लो - आयरिश के रूप में जाने जाते थे और उन्होंने अपने किरायेदारों को सहायता प्रदान करने के लिए अपने राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल करने में कोई मलाल नहीं महसूस किया और वास्तव में उन्होंने इसे अत्यधिक लाभ वाली पशु चराई के लिए और अधिक भूमि पर दावा करने की संभावना के रूप में देखा क्योंकि आयरिश लोग या तो मर गए थे या पलायन कर गए थे। आयरलैंड में खाद्य संकट की समस्या के जवाब में ब्रिटिश सरकार ने इसे पूरी तरह बाजार की ताकतों द्वारा तय करने के लिए छोड़ दिया था। वास्तव में, चूंकि अंग्रेजों ने सदियों से देशज आयरिश लोगों से बलपूर्वक जमीन हड़प ली थी, आइरिश लोगों के पास आलू की खेती के लिए रखी गई थोड़ी सी जमीन के अलावा जीवनयापन के बहुत कम साधन थे। आलू आयरिश लोगों द्वारा पैदा किया जाता था क्योंकि यह प्रति एकड़ एक बहुत ही उच्च कैलोरी वाली उपज होती है। यहां तक कि अगर आयरिश लोग अन्य फसलों को प्राप्त करने में सक्षम भी होते तो भी वे उन्हें आवंटित थोड़ी सी जमीन द्वारा पूरी आबादी की भरपाई करने में सक्षम नहीं होते, केवल आलू की फसल ही ऐसा कर सकती थी। आयरलैंड अकाल के दौरान खाद्यान्न का एक शुद्ध खाद्य निर्यातक था, जबकि ब्रिटिश सेना बंदरगाहों और भोजन डिपो को भूखी जनता से बचाने का काम करती थी।

इसका तात्कालिक प्रभाव 1,000,000 मौतें और 2,000,000 शरणार्थियों का ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया और संयुक्त राज्य अमेरिका में पलायन था। अकाल के बीत जाने के बाद अकाल द्वारा उत्पन्न बंजरता, जमींदारों द्वारा संचालित अर्थव्यवस्था द्वारा प्रेरित बीमारियों एवं उत्प्रवास को पूरी तरह से कम आंकना आबादी के 100 वर्ष पिछड़ने का कारण बना। आयरलैंड की आबादी, जो उस समय अकाल के पूर्व की कुल आबादी की मात्र आधी रह गयी थी, में 1970 (आयलैंड के ज्यादातर भाग के स्वतंत्र होने की आधी शताब्दी बाद) के बाद ही दोबारा से बढ़ोत्तरी देखी गयी। अकाल के बाद आयरिश जनसंख्या में गिरावट का यह वह काल था जब यूरोप की आबादी दुगनी और अंग्रेजों की आबादी चार गुना बढ़ी थी। इसके कारण देश में आबादी अत्यधिक कम हो गई। अकाल द्वारा देश के सर्वाधिक प्रभावित इलाकों (पश्चिमी तट) में आबादी में गिरावट का दौर 1990 के दशक - अर्थात् अकाल तथा ब्रिटिश सरकार की अहस्तक्षेप की आर्थिक नीति के 150 वर्ष बाद - तक भी जारी रहा। अकाल के पूर्व आयरलैंड की आबादी इंग्लैंड की आबादी के आधे से थोड़ा अधिक थी। आज यह 10 % से भी कम है। आयलैंड की आबादी 5 मिलियन है लेकिन आयरलैंड से बाहर आयरिश मूल के लोगों की संख्या 80 मिलियन से अधिक है। जो कि आयरलैंड की आबादी का सोलह गुना है।

रूस और सोवियत संघ 
स्कॉट एवं डंकन (2002) के अनुसार, "1500 ई. से 1700 ई. के मध्य पूर्वी यूरोप ने 150 से अधिक दर्ज हुए अकाल झेले हैं, जबकि रूस में 971 ई. से 1974 ई. तक भुखमरी के 100 वर्ष और अकाल के 121 वर्ष रहे हैं।"

रूसी साम्राज्य प्रत्येक 10 से 13 वर्ष में सूखे और अकाल के लिये जाना जाता है जिसमें से सूखे का औसत प्रत्येक 5 से 7 वर्ष है। 1845 से 1922 के मध्य रूस में ग्यारह बड़े अकाल पड़े जिनमें से 1891-92 का अकाल सर्वाधिक भयंकर था। सोवियत काल में भी अकाल जारी रहे जिसमें से 1932-33 की सर्दियों में देश के विभिन्न भागों, विशेषकर वोल्गा, यूक्रेन, एवं उत्तरी कजाकिस्तान में पड़े अकालों में होलोदोमोर सर्वाधिक कुख्यात था। आज यह माना जाता है कि 1932-1933 के सोवियत अकाल में अनुमानतः 6 मिलियन लोगों की मौत हुई थी। सोवियत संघ में आखिरी बड़ा अकाल वर्ष 1977 में पड़ा था जो कि भयंकर सूखे और सोवियत सरकार द्वारा अनाज भंडार के कुप्रबंधन के कारण पड़ा था।

872 दिनों की लेनिनग्राद की घेराबंदी (1941-1944) के कारण सामान्य प्रयोग की वस्तुओं, पानी, ऊर्जा और खाद्य की आपूर्ति में हुए व्यवधान के कारण लेनिनग्राद क्षेत्र में अद्वितीय अकाल पड़ा. जिसके परिणाम स्वरूप एक मिलियन लोगों की मौत हुई।

लैटिन अमेरिका में अकाल 
कोलंबस के पूर्व के अमेरिकी लोगों ने अक्सर गंभीर खाद्य अल्पता एवं अकालों को झेला है। 850 ई. के आसपास निरंतर सूखा एवं माया सभ्यता का पतन एक साथ घटित हुए एवं वन रैबिट का अकाल मैक्सिको की एक बड़ी महाविपत्ति थी।

1877 -78 में ब्राजील का ग्रेनेड सेका (भयंकर सूखा) जोकि अब तक दर्ज किया गया ब्राजील का सबसे भयंकर सूखा है, में लगभग पांच लाख लोगों की जान गयी थी। 1915 का सूखा भी विनाशकारी था।

इन्हें भी देखें 

 कृषि और आबादी की सीमा
 अकाल से जूझने के लिए एट्मिट (दलिया) का उपयोग
 जलवायु परिवर्तन और कृषि
 सूखा
 भारत में अकाल
 अकाल अर्ली वार्निंग सिस्टम नेटवर्क
 खाद्य मूल्य संकट
 खाद्य रक्षा
 एपोकेलिप्स के चार घुड़सवार
 वैश्विक भूख सूचकांक (ग्लोबल हंगर इंडेक्स)

 माल्थुसियन की तबाही
 अधिक जनसंख्या
 पीक फ़ूड
 सभ्यता, मानव और पृथ्वी ग्रह के लिए खतरा
 भुखमरी
 निर्वाह संकट
 विश्व कृषि आपूर्ति और मांग का आकलन (मासिक रिपोर्ट)
 वर्ल्ड विजन अकाल की घटनायें

प्रकरण अध्ययन:

 अकालों की सूची
 १९४३ का बंगाल का अकाल
 1944 में डच अकाल
 ग्रेट लीप फॉरवर्ड
 होलोडोमोर (यूक्रेनी अकाल)
 इथियोपिया में अकाल
 2010 सहेल अकाल
 मध्ययुगीन जनसांख्यिकी
 ग्रीष्मकालीन बिना वर्ष

पादलेख

सन्दर्भ
अतिरिक्त का अर्थ है "और अधिक" या "तय सीमा से अधिक"।

उदाहरण 
सरकारी नौकरी की कमाई के अतिरिक्त मनजीत का घर-खर्च अपनी पत्नी की कपड़ों की सिलाई से पूरा होता है।

मूल

अन्य अर्थ

संबंधित शब्द

हिंदी में

अन्य भारतीय भाषाओं में निकटतम शब्द 

अतिरिक्त
यह शब्द हिंदी में काफी प्रयुक्त होता है, यदि आप इसका सटीक अर्थ प्रतीक से है
इसका मतलब किसी वस्तु के प्रतीक से है

उदाहरण 
भारत का प्रतिरेक शान्ति है

मूल 
प्रतिरेक हिन्दी के दो शब्दो से मिलकर बना है
प्रति+रेक जिसका अर्थ उसका बिम्ब से है जिसे प्रतीक कहते हैं
अतिरेक <===> REDUNDANCY

अतिरेक <===> ORGY[Noun]

अतिरेक <===> OVERFLOW[Noun]

अन्य अर्थ

संबंधित शब्द

हिंदी में

अन्य भारतीय भाषाओं में निकटतम शब्द 

अतिरेक
दिव्य का अर्थ भगवान से जुडा है। सामान्य रूप से उपयुक्त होने यह शब्द "चमक" का बोध कराता है।

उदाहरण 
उसे एक वरदान के रूप में दिव्य शक्ति प्राप्त हुई है।

मूल: दिव्य और अनंत  
महाकाव्यों में दिव्य शब्द का प्रयोग उसके लिए हुआ है जिसका मसतिष्क अति शक्तीशाली हो। यह शक्ती  बहुत ही कम लोगो के पास होती है और जिनके भी पास होती है वह इसका उपयोग ईश्वर कि अनुमति के बिना नहीं कर सकते।

ईश्वर भी इस शक्ती का उपयोग कम ही करते हैं। 

यह शक्ती जिस मनुष्य के पास होती है वह किसी और को इसके बारे में नहीं बता सकता। वह व्यक्ति अनंत को जानने की क्षमता रखता है। ईश्वर के समान होते हुए भी वह स्वयं को दुसरो के भांति सामान्य मानता है। वह एक मनुष्य रूपी भगवान है।

संस्कृत : देव

अन्य अर्थ 
यह शब्द सामान्य रूप से उपयुक्त होने पर एक ऐसी चमक का बोध कराता है जो सभी को आकर्षित करती हो।

संबंधित शब्द 

भव्य

हिंदी में 
दिव्य संस्कृत विशेषण
1. अलौकिक ; लोकातीत 
2. चमकीला ; दीप्तियुक्त 
3. अतिसुंदर ; भव्य 
4. स्वर्ग या आकाश संबंधी।

संदर्भ

शब्दार्थ
अशिक्षा शब्द का अर्थ शिक्षा रहित होना है।

उदाहरण 
दलाई लामा ने मनुष्य के अधिकांश दुखों के लिए अज्ञान को जिम्मेदार बताया।

मूल
अ + शिक्षा
जैसा कि ऊपर लिखा गया है इस शब्द का निर्माण शिक्षा शब्द के अ उपसर्ग लगाने से होता है। चूँकि अ उपसर्ग का उपयोग निषेध के लिये होता है। अतः अशिक्षा शब्द का अर्थ शिक्षा रहित होना होता है।

अन्य अर्थ 
निरक्षरता

संबंधित शब्द

हिंदी में

अन्य भारतीय भाषाओं में निकटतम शब्द

सन्दर्भ 

अशिक्षा
अभिषेक - राजतिलक का स्नान जो राज्यारोहण को वैध करता था। पुराने काल मैं जब किसी को राजा बनाया जाता था तो उस के सिर पर अभिमन्त्रित जल और औषधियों की वर्षा की जाती थी। इस क्रिया को ही अभिषेक कहते है। अभि उपसर्ग और सिंच् धातु कि सन्धि से अभिषेक शब्द बना है। कालांतर में राज्याभिषेक राजतिलक का पर्याय बन गया।

प्राचीन साहित्य में अभिषेक 
अथर्ववेद में अभिषेक शब्द कई स्थलों पर आया है और इसका संस्कारगत विवरण भी वहाँ उपलब्ध है। कृष्ण यजुर्वेद तथा श्रौत सूत्रों में हम प्राय: सर्वत्र "अभिषेचनीय" संज्ञा का प्रयोग पाते हैं जो वस्तुत: राजसूय का ही अंग था, यद्यपि ऐतरेय ब्राह्मण को यह मत संभवत: स्वीकार नहीं। उसके अनुसार अभिषेक ही प्रधान विषय है।

ऐतरेय ब्राह्मण ने अभिषेक के दो प्रकार बतलाए हैं:

(1) पुनरभिषेक (अष्टम 5-11);

(2) ऐंद्र महाभिषेक (अष्टम, 12-20)।

इनमें से प्रथम का राजसूय से संबंध जान पड़ता है, न कि यौवराज्य अथवा सिंहासनग्रहण से। ऐंद्र महाभिषेक अवश्य इंद्र के राज्याभिषेक से संबंधित है। उक्त ब्राह्मण ग्रंथ में ऐसे सम्राटों की सूची भी दी हुई है जिनका अभिषेक वैदिक नियम से हुआ था। ये हैं:

(1) जन्मेजय पारीक्षित, तुर कावशेय द्वारा अभिषिक्त,

(2) शार्यात मानव, च्यवन भार्गव द्वारा अभिषिक्त,

(3) शतानीक सात्राजित, सोम शष्मण वाजरत्नायन द्वारा अभिषिक्त,

(4) आंबष्ठय, पर्वत और नारद द्वारा अभिषिक्त,

(5) युंधाश्रुष्ठि औग्रसैन्य, पर्वत और नारद द्वारा अभिषिक्त,

(6) विश्वकर्मा च्यवन, कश्यप द्वारा अभिषिक्त,

(7) सुदास पैजवन, वसिष्ठ द्वारा अभिषिक्त,

(8) मरुत्त अविच्छित्त, संवर्त आंगिरस द्वारा अभिषिक्त,

(9) अंग उद्मय आत्रेय,

(10) भरत दौष्यंत, दीर्घतमस यायतेय।

निम्नांकित राजा केवल सस्कार के ज्ञान से विजयी हुए:

(1) दुर्मुख पांचाल, बृहसुक्थ से ज्ञान पाकर,

(2) अत्यराति जानंतपि (सम्राट् नहीं) वसिष्ठ सातहव्य से ज्ञान पाकर।

इन सूचियों के अतिरिक्त कुछ अन्य सूचियाँ प्रसिद्ध पाश्चात्य तत्वज्ञ गोल्डस्टूकर ने दी हैं। आगे चलकर महाभारत में युधिष्ठिर के दो बार अभिषिक्त होने का उल्लेख मिलता है, एक सभापर्व (200,33,45) और दूसरा शांतिपर्व, 100,40 में।

मौर्य सम्राट् अशोक के संबंध में हम यह जानते हैं कि उसे यौवराज्य के पश्चात् चार वर्ष अभिषेक की प्रतीक्षा करनी पड़ी थी और इसी प्रकार हर्ष शीलादित्य को भी, जैसा "महावंश" एवं युवान च्वांग के "सि-यूकी" नामक ग्रंथों से ज्ञात होता है। कालिदास ने भी रघुवंश के द्वितीय सर्ग में अभिषेक का निर्देश किया है। ऐतिहासिक वृत्तांतों से ज्ञात होता है कि आगे चलकर राजसचिवों के भी अभिषेक होने लगे थे। हर्षचरित में "मूर्धाभिषिक्ता अमात्या राजान:" इस प्रकार का संकेत पाया जाता है। आगे चलकर अनेक ऐतिहासिक सम्राटों ने प्राय: वैदिक विधान का आश्रय लेकर अभिषेक क्रिया संपादित की, क्योंकि उसके बिना सम्राट् नहीं माना जाता था। अभिषेक के कतिपय अन्य सामान्य प्रयोगों में प्रतिमाप्रतिष्ठा के अवसर पर उसका आधान एक साधारण प्रक्रिया थी जो आजकल भी हिंदुओं में भारत एवं नेपाल में प्रचलित है।

एक विशिष्ट अर्थ में अभिषेक का प्रयोग बौद्ध "महावस्तु" (प्रथम 124.20) में हुआ है जहाँ साधना की परिणति दस भूमियों में अंतिम "अभिषेक भूमि" में बतलाई गई है।

अभिषेक का विधान 
वैदिक एवं उत्तर वैदिक साहित्य में अभिषेक का जो विधान दिया गया है वह निम्नलिखित है। प्राय: अभिषेक के समय, उसके कुछ पहले, अथवा उसके बीच में सचिवों की नियुक्ति होती थी और इसी प्रकार अन्य राजरत्नों का निर्वाचन भी सम्पन्न होता था जिनमें साम्राज्ञी, हस्ति, श्वेतवाजि, श्वेतवृषभ मुख्य थे। उपकरणों में श्वेतछत्र, श्वेतचामर, आसन (भद्रासन), सिंहासन, भद्रपीठ, परमासन, स्वर्णविरचित एवं अजिनआवृत तथा मांगलिक द्रव्यों में स्वर्णपात्र (अनेक स्थानों से लाए गए जल से भरे), मधु, दुग्ध, दधि, उदुंबरदंड एवं अन्य वस्तुएँ रखी जाती थीं। भारतीय अभिषेकविधान में जिस उच्च कोटि के मांगलिक द्रव्य और उपकरण प्रयुक्त होते थे वैसे प्राचीन ईसाइयों अथवा सामी (सेमेटिक) राज्यारोहण की क्रियाओं में नहीं होते थे। इस प्रसंग में यह उल्लेखनीय है कि अभिषेक एक सिद्धांत प्रक्रिया के रूप में केवल इसी देश की स्थायी संपत्ति है, अन्य देशों में इस प्रकार के सिद्धांत इतने अस्पष्ट और उलझे हुए हैं कि उनका निश्चयात्मक सिद्धांत-स्वरूप नहीं बन पाया है; यद्यपि शक्तिसाधना और ऐश्वर्य की कामना रखनेवाले सभी सम्राटों ने किसी न किसी रूप में स्नान, विलेपन को प्रतीक का रूप देकर इस संस्कार का आश्रय लिया है।

सन्दर्भ ग्रन्थ 
 ऐतरेय ब्राह्मण; गोल्डस्टूकर डिक्शनरी ऑव संस्कृत ऐंड इंग्लिश, बर्लिन, 1856;
 इंसाइक्लोपीडिया ऑव रेलिजन ऐंड एथिक्स, भाग प्रथम, एडिन., 1955।

अभिषेक
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अभ्यागत का अर्थ:- अतिथि से तात्पर्य है, जो बिना पूर्व सूचना के आए और अभ्यागत से तात्पर्य है, जिसके आने की पूर्व में सूचना प्राप्त हो।

उदाहरण

मूल

अन्य अर्थ 
भेट देनेवाला, 
आगन्तुक, 
visitor (in English)

संबंधित शब्द

हिंदी में

अन्य भारतीय भाषाओं में निकटतम शब्द 

अभ्यागत
अलख (संस्कृत :अलक्ष्य ) का अर्थ है, जो दिखाई न पड़े, अदृश्य, अप्रत्यक्ष। उदाहरण- 'अलख न लखिया जाई' (कबीर)। अगोचर, इंद्रियातीत, परमात्मा का एक विशेषण। 'अलख अरूप अवरन सो करता ' - जायसी।

 (१) शून्य, परमात्मा, अविनश्वर नाम जिसका स्मरण गूदरपंथी और नाथ जोगी साधु, घर-घर भिक्षा मांगते समय, 'अलख अलख' पुकार का दिलाया करते हैं।
 (२) नाथपंथी जोगियों का वह गीत जो भिक्षा मांगते समय, प्राय: चिकारों पर गाया जाता है और जिसमें अधिकतर गोपीचंद, भरथरी, गोरख, पूरन भगत या मैनावती की कथाएँ अथवा निगुण मत की भावनाएँ पाई जाती है; निरगुनियां गीत। इसी से 'अलख जगाना' एक मुहावरा ही बन गया।

'अलखदरीबा' वह स्थान जहाँ पर संत दादूदयाल अपने अनुयायियों के साथ बैठकर आध्यात्मिक चर्चा किया करते थे।

'अलख निरंजन' परमात्मा का एक नाम जो उसके शून्यवत अदृश्य रहने के कारण पड़ा।

'अलखवाला' जोगियों का एक उपसंप्रदाय।

अलख शब्द से संबंधित कुछ और संप्रदाय भी हैं, यथा 'अलखधारी' भारत के पश्चिमोतर प्रदेशों का एक संप्रदाय, जिसके अनुयायी अलख अगोचर तत्त्व का ध्यान करते हैं। 'अलखनामी' संप्रदाय।

हिन्दू धर्म
अखिल का अर्थ होता है - सम्पूर्ण, व्यापक।

उदाहरण 
 किसानों का अखिल भारतीय सम्मेलन। (संपूर्ण भारत के किसानों का सम्मेलन)।
 अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद - यह एक छात्र संगठन है जो पूरो भारत में सक्रिय है।
 अखिल भारतीय आन्दोलन - पूरे भारत में व्याप्त आंदोलन।
 अखिल भारतीय मज़दूर संघ

मूल 
 संस्कृत

अन्य अर्थ 
 अखिल एक हिन्दू, पुरुषवाचक नाम भी है।
 सम्पूर्ण्, समस्त, अखंड।

संबंधित शब्द

हिंदी में 
 [[संAkhilपूर्ण]] 
 व्याप्त
 क्षेत्रीय - अखिल का लगभग विपरीत।

अन्य भारतीय भाषाओं में निकटतम शब्द 

शब्दार्थ
घर का बाहरी खुला हिस्सा, जहाँ से घर के अन्दर प्रवेश किया जाता है।

उदाहरण 
 अंगने में औरतें रंगोली बना रही हैं।
 जब वी मेट चलचित्र में एक गाने के बोल : आओगे जब तुम साजना, अंगना फूल खिलेंगे।

मूल 
आँगन देशज शब्द है।

अन्य अर्थ 
सुन्दर नारी

संबंधित शब्द

हिंदी में 
आँगन

अन्य भारतीय भाषाओं में निकटतम शब्द

सन्दर्भ 

शब्दार्थ
अल्हड़ का अर्थ है उन्मुक्त, बाधारहित नियंत्रण विहीन नवप्राप्य।

उदाहरण 
 मैं ही ऐसी अल्हड़ थी कि तुम्हारे फंदे में आ गई।

मूल

अन्य अर्थ

संबंधित शब्द

हिंदी में

अन्य भारतीय भाषाओं में निकटतम शब्द

सन्दर्भ 

शब्दार्थ
अभिवादन (greeting) मानव संचार की वह क्रिया होती है जिसमें व्यक्ति एक-दूसरे को अपनी उपस्थिति से अवगत कराते हैं और दूसरे की उपस्थिति को स्वीकारते हैं। अक्सर इसमें दूसरे की उपस्थिति का स्वागत करा जाता है या उसपर प्रसन्नता जतलाई जाती है। आमतौर पर यह व्यक्तियों में आपसी-सम्बन्ध का भी संकेत होता है, चाहे वह औपचारिक हो या अनौपचारिक। अभिवादन परम्पराएँ स्थानों और संस्कृतियों के अधार पर बहुत भिन्न होती हैं लेकिन वे विश्व के हर सामाज में पाई जाती हैं। अभिवादन शारीरिक संकेत (मसलन नमस्ते या हाथ का हिलाना या सिर का झुकाना), बोलकर या इन दोनों को मिलाकर करा जाता है। पत्र या ईमेल जैसे लिखित संचार में भी अभिवादन व्यत्क्त करा जा सकता है।

कुछ भाषाओं में एक ही शब्द या संकेत किसी का स्वागत करने के लिये और उस से विदा होने के लिये प्रयोग होता है। उदाहरण के लिए अंग्रेज़ी में "गुड डे" (Good day), अरबी में "अस-सलाम-आलेकुम" (السلام عليكم), इब्रानी में "शालोम" (שָׁלוֹם) और इतालवी में "च्याओ" (Ciao)। सिर-झुकाना और हाथ मिलाना भी मिलने व विदा करने दोनों के लिये प्रयोगित हैं।

इन्हें भी देखें 
 नमस्ते

सन्दर्भ
व्याख्या एक हिन्दी शब्द है।

उदाहरण

मूल

अन्य अर्थ

संबंधित शब्द

हिंदी में 
  
मन अति भयो उलास,

अन्य भारतीय भाषाओं में निकटतम शब्द 

शब्दार्थ
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उदाहरण

मूल

अन्य अर्थ

संबंधित शब्द 
व्याख्यान

अन्य भारतीय भाषाओं में निकटतम शब्द 

शब्दार्थ
व्याख्याता एक हिन्दी शब्द है।

उदाहरण

मूल

अन्य अर्थ

संबंधित शब्द 
रतद्

अन्य भारतीय भाषाओं में निकटतम शब्द 

शब्दार्थ
व्याधि एक हिन्दी शब्द है।
शरीर की प्राकृतिक अवस्था में रुकावट /व्यवधान हो जाना जिससे मनुष्य की दिनचर्या; रात्रिचर्या; इन सभी में अव्यवस्थता आ जाए उसे व्याधि कहते हैं|
शरीर की स्वभाविक अवस्था में विकार आ जाए वही व्याधि है|

उदाहरण 
1. अतिसार= मल मार्ग से द्रव्ययुक्त मल का अति सरण होना|
A.शोथमय उत्सेध 
B. प्रमेह आविल मूत्रता
 @ निदान सेवन से कुपित हुए दोष स्वयं स्थान को त्याग कर संपूर्ण शरीर में विचरण करते हुए स्रोतों के स्थान पर रुक जाते हैं वहीं पर कुपित दोषों का दूषित धातु के साथ मिलकर मिलकर जो लक्षण प्रकट होते हैं व्याधि कहलाती है 
शरीर का अपनी सामान्य स्थिति से असामान्य स्थिति में आना व्याधि कहलाता है

मूल

अन्य अर्थ

संबंधित शब्द

हिंदी में 
 [व्याधि ]
आम्य,गंध<रोग>,आतंक, ज्वर,विकार, पाप्मा, तम, दुख आदि

अन्य भारतीय भाषाओं में निकटतम शब्द 

शब्दार्थ
व्याध मूलत: संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका हिन्दी भाषा में अर्थ होता है शिकारी। वैसे कालिका प्रसाद के वृहत् हिन्दी कोश में इसका अर्थ शिकार द्वारा जीविका चलाने वाली एक संकर जाति बताया गया है जिसे आमतौर पर बहेलिया कहा जाता है। इस शब्द का एक और लाक्षणिक अर्थ नीच या कमीना आदमी भी है।

उदाहरण 
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' की समर शेष है नामक कविता की ये पंक्तियाँ व्याध को काफी कुछ परिभाषित करती हैं-
"समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध, जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।"

मूल 
व्याध उस व्यक्ति को कहा जाता है जो जंगली जानवरों को मारता अथवा वध करता है। व्याध को शिकारी भी कहा जाता है। कुछ शौकिया शिकारी होते हैं और कुछ अन्य उपयोग के लिये शिकार करते हैं।

सम्बन्धित शब्द

हिन्दी में 
 शिकारी (हिरन आदि पशुओं को मारने वाला), बहेलिया (पक्षियों को जाल में फँसाने वाला), लुब्धक (लालच देकर फँसाने वाला), आखेटक (शौकिया शिकार करने वाला)

अन्य भारतीय भाषाओं में निकटतम शब्द 
 अरबी में सय्याद अथवा सैयाद जिसका जिसका अर्थ है धोखे से फँसाकर शिकार करने वाला।
 उर्दू में चिड़ीमार या चिड़ियाँ पकड़ने वाला, जिसे हिन्दी में लुब्धक कहते हैं।

सन्दर्भ 

शब्दार्थ
वर्जित एक हिन्दी शब्द है।

उदाहरण

मूल

अन्य अर्थ

संबंधित शब्द

हिंदी में

अन्य भारतीय भाषाओं में निकटतम शब्द 

शब्दार्थ
स्वाभिमान या आत्म-सम्मान किसी के स्वयं के मूल्य, क्षमताओं या सदाचार में विश्वास है। स्वाभिमान में स्वयं के बारे में विश्वास (उदाहरणार्थ, "मुझे प्यार किया जाता है", "मैं योग्य हूँ") और साथ ही विजय, निराशा, गर्व और शर्म जैसी भावनात्मक स्थितियाँ शामिल हैं।  स्मिथ और मैकी (2007) ने इसे यह कहते हुए परिभाषित किया कि " आत्म-धारणा वह है जो हम स्वयं के बारे में सोचते हैं; स्वाभिमान, स्वयं का सकारात्मक या नकारात्मक मूल्यांकन है, जैसा कि हम इसके बारे में कैसा महसूस करते हैं (आत्मन् देखें)।" 

स्वाभिमान एक आकर्षक मनोवैज्ञानिक निर्माण है क्योंकि यह कुछ परिणामों की भविष्यवाणी करता है, जैसे शैक्षणिक उपलब्धि,   सुख,  विवाह और सम्बन्धों में सन्तुष्टि,  और आपराधिक व्यवहार।  माना जाता है कि उच्च स्वाभिमान के लाभों में बेहतर मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य और कम असामाजिक व्यवहार शामिल हैं  जबकि कम स्वाभिमान के नुकसान में चिन्ता, ऐकल्य और स्वापकों के सेवन के प्रति बढ़ती संवेदनशीलता शामिल पाई गई है।

सन्दर्भ
अभिमान 1973 में बनी हिन्दी भाषा की संगीतमय नाट्य फिल्म है। इसमें अमिताभ बच्चन, जया बच्चन, असरानी और बिन्दू हैं। इसे ऋषिकेश मुखर्जी ने निर्देशित किया था। मजरुह सुल्तानपुरी द्वारा लिखित और सुप्रसिद्ध गायक मोहम्मद रफी, लता मंगेशकर और किशोर कुमार द्वारा गाए गए और सचिन देव बर्मन द्वरा संगीतबद्ध किए गए इस फिल्म को संभवतः इसके गानों के लिए सबसे ज्यादा याद किया जाता है। 

फिल्म ने उस समय प्रकाशित बॉलीवुड व्यापार पत्रिका के अनुसार बॉक्स ऑफिस पर औसत कारोबार किया। जया बच्चन ने अभिमान के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का फिल्मफेयर पुरस्कार जीता। कुछ समीक्षकों अनुसार ये फिल्म सितार वादक रवि शंकर और अन्नपूर्णा देवी के बीच परेशानी भरी शादी पर आधारित है। लेखक राजू भारतान के अनुसार, ऋषिकेश मुखर्जी ने गायक किशोर कुमार और उनकी पहली पत्नी, रूमा घोष के जीवन फिल्म की कहानी  आधारित की थी।

संक्षेप 
सुबीर कुमार (अमिताभ बच्चन) एक पेशेवर गायक है जो समृद्धि की ओर अग्रसर है। उमा (जया भादुडी) से मिलने तक उसका शादी करने का विचार नहीं था। उमा गाँव में दुर्गा मौसी (दुर्गा खोटे) के साथ रहती है। उससे शादी कर बम्बई ला उससे गायकी का पेशा शुरू करना चाहता है। इस बीच उसकी गायकी डगमगाती है और उमा की उभरती है और अपने पति से भी प्रसिद्ध गायक बनती है। इस पर सुबीर उमा से द्वेष करने लगता है और उनके वैवाहिक जीवन में तनाव होता है। एक संवेदनात्मक मोड़ पर दोनों के बिछड़ने के बाद उमा का गर्भपात होता है। क्या सुबीर अपने अभिमान व द्वेष पर विजय पाता है?

ऋषिकेश मुखर्जी के इस श्रेष्ठतम निर्देशन में गीत तेरे मेरे मिलन की ये रैना से अन्त में दोनों का भावनात्मक मिलन दिखाया गया है।

मुख्य कलाकार 
 अमिताभ बच्चन - सुबीर कुमार
 जया बच्चन - उमा कुमार
 असरानी - चंदर कृपलानी
 डेविड - ब्रजेश्वरलाल
 बिंदू - चित्रा
 दुर्गा खोटे - दुर्गा मौसी
 ए के हंगल - सदानन्द
 ललिता कुमारी - राधा

दल 
 निर्देशक - हृषिकेश मुखर्जी
 कथा - हृषिकेश मुखर्जी
 पटकथा - नबेंदु घोष, बीरेश चेटर्जी, मोहिनी एन सिप्पी
 संवाद - राजेन्द्र सिंह बेदी
 निर्माता - सुशीला कामत, पवन कुमार
 संपादक - दास धैमाड़े
 छायांकन - जयवंत पठारे
 कला निर्देशक - अजित बेनर्जी
 वेश एवं भूषा - शालिनी शाह, रामलाल महेश्वरी
 निर्माण प्रबंधक - जे एस त्रिपाठी, प्रकाश वालावलकर, उदय वालावलकर
 सहायक निर्देशक - शकील चंद्रा, सुशीला कामत, नितिन मुकेश
 सहायक सम्पादक - हरी भोईर, श्रीधर मिश्रा, शंकर प्रधान
 सहायक कला निर्देशक - महेंद्र बलासिनोर्वाला, शंकर कुराड़े
 संगीत सहायक - मीरा देव बर्मन, अनिल मोहिले, अरुण पौडवाल, मारुती राव
 पार्श्वगायक - किशोर कुमार, लता मंगेशकर, मोहम्मद रफ़ी, मनहर उधास, सचिन देव बर्मन, सुनील कुमार, अनुराधा पौडवाल

संगीत 
 गीत "तेरे मेरे मिलन की ये रैना" बिनाका गीत माला की 1973 वार्षिक सूची पर 16वीं पायदान पर रही। 
 गीत "मीत न मिलारे मनका" बिनाका गीत माला की 1973 वार्षिक सूची पर 23वीं पायदान पर रही।

नामांकन और पुरस्कार 

|-
| rowspan="3"|१९७४
| सचिन देव बर्मन
| फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ संगीतकार पुरस्कार
| 
|-
| जया बच्चन
| फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार
| 
|-
| असरानी
| फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता पुरस्कार
| 
|}

सन्दर्भ

बाहरी कड़ियाँ 
 

1973 में बनी हिन्दी फ़िल्म
एस॰ डी॰ बर्मन द्वारा संगीतबद्ध फिल्में
हिन्दी फ़िल्में वर्णक्रमानुसार
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उदाहरण

मूल

अन्य अर्थ

संबंधित शब्द

हिंदी में

अन्य भारतीय भाषाओं में निकटतम शब्द 

शब्दार्थ
कोई भी ऐसा सम्प्रेसन जो श्रोता की मनोवृत्ति में परिवर्तन करना चाहता है, अनुनयन कहलाता है

उदाहरण-  किसी पार्टी का श्लोगन जैसे "अच्छे दिन आने वाले हैं"

मूल

निवेदन करना

प्रार्थना करना

हिंदी में

अन्य भारतीय भाषाओं में निकटतम शब्द 

शब्दार्थ
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उदाहरण 
विनीत मतलब जो उसमे का मुख्य हो या उस कार्य को करा रहा हो जैसे :- की शादी कार्ड , कोई भी निमंत्रण कार्ड होता है उसमें लिखा होता है।

मूल 
विनीत शब्द का मूलार्थ विनम्रता के भाव से युक्त व्यक्ति से है । जिसकी विनम्रता स्वभावानुसार वा 
भगवत्कृपा से "सहज" हो ।

अन्य अर्थ

संबंधित शब्द

हिंदी में

अन्य भारतीय भाषाओं में निकटतम शब्द 

शब्दार्थ
साकार होने का अर्थ है (सपनों, इरादों, आदि) का पूरा होना।

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उदाहरण 
 मुंबई में एक नए मकान और रोज़गार के साथ सह-परिवार बस जाना उसके लिए अपने सपनों का साकार होना था।

मूल

अन्य अर्थ

संबंधित शब्द

हिंदी में

अन्य भारतीय भाषाओं में निकटतम शब्द 

शब्दार्थ
संयोग का अर्थ इत्तेफ़ाक़ है। 

संयोग एक हिन्दी शब्द है।

उदाहरण 
 मेरे जीवन का रूमानी संयोग शुरू हुआ। (मेरे जीवन का रूमानी संयोग शुरू हुआ)

मूल

अन्य अर्थ

संबंधित शब्द

हिंदी में

अन्य भारतीय भाषाओं में निकटतम शब्द 

शब्दार्थ
दुर्योग एक हिन्दी शब्द है।

उदाहरण

मूल

अन्य अर्थ

संबंधित शब्द

हिंदी में

अन्य भारतीय भाषाओं में निकटतम शब्द 

शब्दार्थ
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उदाहरण 
अरे बता दो मुझे कहाँ प्रवासी है मेरा
इसी बावले से मिलने को डाल रही है हूँ मैँ फेरा

मूल

अन्य अर्थ

संबंधित शब्द

हिंदी में

अन्य भारतीय भाषाओं में निकटतम शब्द 

शब्दार्थ